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Wednesday, August 31, 2011

कैसे बिकता है प्रतिबंधित कीटनाशक?

आपसे बेहतर इस तथ्य को कौन समझ सकता है कि खेती के मामले में जहर पर हमारी निर्भरता कितनी बढ़ चुकि है। फसल उगाने से पहले खेत में जहर डालना शुरू करते हैं तो भण्डारण तक नहीं रूकते। बात यहीं खत्म हो जाती तो गनीमत था, अब तो फल-सब्जियों को पकाने और देर तक ताजा रखने के लिए भी जहर का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। एक आश्चर्यजनक सच्चाई यह भी है कि दुनिया भर में प्रतिबंधित कीटनाशकों को भारत में खुलेआम बेचा और प्रयोग किया जा रहा है। फल-सब्जियों पर इनके प्रयोग से न केवल कैंसर जैसी जान लेवा बीमारियों को सीधे न्योता दिया जा रहा है, बल्कि अल्सर, चर्म रोग, हृदय रोग, रक्तचाप जैसी बीमारी भी तेजी से फैल रही हैं।
फल-सब्जियों पर जहर के प्रयोग को रोकने के लिए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली अब तक 27 से ज्यादा कीटनाशकों पर आंशिक या पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा चुकी है। इसके बावजूद पूरे देश में ऐसे कीटनाशकों की बिक्री बेरोकटोक जारी है। हालांकि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देशभर के कृषि व फल वैज्ञानिकों को इन प्रतिबंधित दवाओं की सूची उपलब्ध करावा दी है। परिषद ने यह जिम्मेवारी कृषि वैज्ञानिकों को सौंपी हे कि वे किसानों को ऐसे कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले नुकसान से अगाह करें।
राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 27 कीटनाशकों व कीटनाशक मिश्रण को जिनका प्रयोग भारत में होता है को प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा दो कीटनाशक ऐसे जिनका भारत में उपयोग प्रतिबंधित कर दिया गया है, पर इनका उत्पादन निर्यात के लिए किया जा सकता है। चार कीटनाशक मिश्रण ऐसे भी हैं जिनके उपयोग, उत्पादन व आयात को भी प्रतिबंधित किया गया है। सात कीटनाशकों को कंपनियों अथवा निर्माताओं द्वारा बाजार तक पहुंचने के पहले ही हानिकारक मानकर वापस ले लिया गया तथा 18 कीटनाशकों का तो निबंधन करने तक से मना कर दिया गया है। इसके अलावा 13 कीटनाशक वो हैं जिन्हें देश में कम इस्तेमाल करने की नसीहत दी गई है।
आपकी सुविधा के लिए उन 27 कीटनाशकों व कीटनाशक मिश्रण की सूची प्रकाशित है जिनके प्रयोग पर देश में प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें एल्ड्रिन, बेंजीन हेक्साक्लोराइड, कैल्शियम साइनाइड, क्लोरडेन, कापर एसीटोरसेनाइट, ब्रोमोक्लोरोप्रोप्रेन, एन्ड्रिन, इथाइल मरकरी क्लोराइड, इथाइल पैराथियान, हेप्टाक्लोर, मेनाजोन, नाइट्रोफेन, पांराक्वेट डाईमिथाइल सल्फेट, पेंटाक्लोरो नाइट्रोबेंजीन, पेंटाक्लोरोकेनोल, फिनायल मरकरी एसिटेट, सोडियम मैथेन अर्सोनेट, टेट्राडिफोन, टांक्साफेन ,एल्डीकार्ब, क्लोरोबंजिलेट, डाइब्रोमाइड, ट्राईक्लोरोएसिटिक एसिड, मेटोक्सारांन, क्लोरोकेनविनकांस है।
आंशिक प्रतिबंधित रसायन -मिथइल पैराथियान दो प्रतिशत धूल या 50 प्रतिशत ईसी फल व सब्जियों पर, मिथाक्सी इथाइल मर्करी क्लोराइड का प्रयोग आलू और गन्ने के बीज के लिए प्रयोग किया जाएगा, शेष पर प्रतिबंध, मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत सब्जियों पर और सोडियम साइनाइड केवल कपास के गूलर के लिए प्रयोग होगा, वह भी विशेषज्ञ की मौजूदगी में। डीटीटी सभी फसलों पर प्रतिबंधित, एल्यूमीनियमफास्फाइड 56 प्रतिशत के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध, आल्डिन बेंजिन हैक्सा क्लोराइड, केल्सियम साइनाइड, क्लोरोडेन, डाइब्रोमा प्रोपेन, इन्डिन 20 ईसी, इथाइल मर्करी क्लोराइड, हप्टा क्लोर, मेनाजोन नाइटोफेन, क्लोरोबेन्जीलेट, केप्टाफाल 80 फीसदी चूर्ण, मैथेमिल 125 प्रतिशत, एल फास्फोमिडान 85 प्रतिशत, कार्बोफ्यूरान 50 प्रतिशत के अलावा लिण्डेन और इण्डोसल्फान पूरी तरह से प्रतिबंधित।
धड़ल्ले से बिक रहे प्रतिबंधित कीटनाशक
कृषि विशेषज्ञों से मिली जानकारी अनुसार बिटाबैक्स नामक दवाई अमेरिका में प्रतिबंधित है और वहां से तैयार हो कर भारत में आ रही है। इसका प्रयोग यहां गेहूं में कीड़ा न लगने के लिए किया जाता है।  प्रतिबंध के बावजूद कुछ रसायनों की बिक्री नाम बदलकर धड़ल्ले से हो रही है। इनमें से कुछ रसायन ऐसे हैं जो तत्काल और कुछ लंबे समय बाद अपना असर दिखाते हैं। जानते हैं उनके टेक्निकल नाम और वो नाम जिससे ये रसायन बाजार में बेचे जा रहे-
1. इथाइल मर्करी क्लोराइड--एगिसान, बैगलाल-6
2. मेथोमिल--रनेट, लैनेट, क्रिनेट
3. कार्बोफयूरॉन--प्यूराडान, अनुक्यूरान, डायफ्यूरॉन, सूमो, प्यूरी
4. फोरेट 10 प्रतिशत दानेदार--घन 10जी, अनुमेट फोरिल, फोरोटाक्स, बुकेर जी, पैराटाक्स, बेज इनमेट, वीरफोर
5. लिण्डेन गामा--लिसटाफ, देवीगामा, लिनडस्ट, केनोडेन, रसायन लिण्डेन, हिलफाल कैल्थेन, फलश कमाण्डो मेगाएडा
6. मिथाइल पैराथियान--पेरासिड 50, थानुमार, मेटासिड, फामिडाल चूर्ण, पैराटॉफ, धानुडाल, क्लोफॉस, क्लोरिसिड
7. मोनो क्रोटोफॉस-- विलकॉस, मोनोसिड, गार्जियन, मोनोधन, बलवान मनोहर, रसायन फॉस, लूफास, मोनोसिल आदि।
क्या कहता है कानून?
भारत सरकार ने प्रतिबंधित व निषिद्ध रसायनों की बिक्री रोकने के लिए सख्त कानून बनाएं हैं। कीटनाशक एक्ट 1968 की धारा 29 के तहत ऐसे रसायन बेचने वालों को दस से पचास हजार रुपये तक का जुर्माना या दो साल की कैद हो सकती है।

Tuesday, August 30, 2011

किस कीमत पर चाहिए फसलें?

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में कीटनाशक  एंडोसल्फान की विक्रय और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों को जारी कर दिए हैं। दुनिया के लगभग 82 देशों में इस पर पूर्ण प्रतिबंध है। एक अकेले एंडोसल्फान की क्या बात करें, तमाम कीटनाशकों का नासमझी भरा प्रयोग जीव-जंतुओं और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हमें ज्यादा कमाई के लिए ज्यादा उत्पादन चाहिए। ज्यादा उत्पादन के लिए हम कितना भी खर्चा कर सकते हैं, जेब में न हो तो कर्ज लेकर  भी कर सकते हैं। हमारे खेत, फसल और किसान पूरी तरह से घातक रसायनों में ही डूबे हुए हैं। हमारे यहां एक हेक्टेयर में 600 से 800 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक तथा 7 से 10 लीटर रासायनिक कीटनाशक छिड़के जा रहे है। रसायनों  का  भारत में औसत उपयोग 94.5 किलो है, जबकि पंजाब 209.60 किलो और आंध्रप्रदेश 219.48 तथा तमिलनाडु 186.68 किलो रसायनों का छिड़काव करते हैं।
दरअसल ये शुरूआत तो 70 के दशक से हरित क्रांति नाम पर हुई, जिसने हमें उन्नत बीज, रासायनिक पदार्थ और ट्रेक्टर-थ्रेशर जैसी मशीन आधारित तकनीकें दी पर भारतीय किसान और सरकार से यह निर्णय करने का अधिकार छीन लिया कि वह कैसे खेती करना चाहते हैं। इस तकनीकि उन्नति ने किसानों को उनकी सालाना आय से चार गुना ज्यादा कर्जदार कर दिया है और उसके खेतों का उपजाऊपन भी छीन लिया है। आज किसान जिस स्थिति में पहुंच गया है उसे खेती का संकटकाल कहा जा सकता है। आज वह पारम्परिक,  कम ऊर्वरक, कम कीटनाशक और कम पानी वाली फसलों को छोड़कर नकद फसलों  के मकडज़ाल में फस गया है, इसका एक प्रमाण तो यह है कि जहां 1991 में किसान पर औसत कर्ज ढाई हजार रूपये था वह आज बढ़कर 35 हजार रूपये के पार जा चुका है।
सवाल यह है कि आखिर हमें किस कीमत पर फसलें चाहिएं? अपनी जान की कीमत पर या बैंक और साहूकारों के यहां खुद को गिरवी रख कर? ईमानदारी भरा जवाब तो यह है कि हमें और हमारे कृषि वैज्ञानिकों तथा खेती के लिए योजनाएं बनाती सरकार किसी को भी नहीं मालूम कि होना क्या चाहिए। कीटनाशकों का इस्तेमाल बिना विकल्पों के छोड़ा नहीं जा सकता और जो विकल्प हैं वे या तो आजमाए हुए नहीं हैं या भरोसे के  लायक नहीं हैं। किसान आज इन स्थितियों से बाहर निकलना भी चाहे तो आर्थिक परेशानियां, सरकारी नीतियां और बाजार का दबाव उसे निकलने नहीं देगा। एक राजस्थानी कहावत की अर्थ यह है कि विधवा तो किसी तरह अपना समय गुजार भी ले पर समाज के दुश्चरित्र लोग उसे ऐसा करने नहीं देते।

-भू-मीत, १५ सितम्बर-१६ अक्तूबर का सम्पादकीय

Friday, August 12, 2011

विकलांग बच्चों के परिजनों हेतु विशेष बीमा योजना


क्या है इस योजनाओं में
ये बीमा योजनाएं केवल उन लोगों के लिए है,जिनके बच्चे विकलांगता के शिकार हैं और जिन्हें जीवन भर विशेष देखभाल की जरूरत पड़ेगी। ऐसे बच्चों के माता-पिता को हमेशा यह चिंता भी सताती रहती है कि उनके बाद इन बच्चों का देखभाल कौन करेगा। ऐसे लोगों के लिए ये बीमा योजनाएं एकदम उपयुक्त है। दरअसल ये सभी ग्रूप बीमा योजनाएं है जिनके तहत ऑटिज्म (आत्मकेन्द्रित), सेरेब्रल पॉल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात), मेंटली रिटार्डिड (मंदबुद्धि) और बहु विकलांगता से ग्रसित बच्चों के माता-पिता, अभिभावक और उनका पालन-पोषण करने वाले लोगों का बीमा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि देश में इस समय इस तरह की विकलांगता से ग्रसित करीब 22लाख लोग हैं। अन्य बीमा कंपनियों के पास भी इस तरह की पॉलिसी उपलब्ध हैं, लेकिन वे नेशनल ट्रस्ट की इन योजनाओं के मुकाबले में काफी महंगी हैं, जिन्हें एक सामान्य व्यक्ति नहीं खरीद सकता।
योजना का लाभ क्या हैं?
अस्मिता योजना के तहत विशेष देखभाल की जरूरत वाले विकलांग बच्चों और उनके माता-पिता या अभिभवकों का एक से दस लाख रुपए का जीवन बीमा किया जाता है। योजना के तहत केवल एक ही व्यक्ति को फायदा मिल सकता है। एक बच्चे के साथ केवल माता-पिता या अभिभवक में से किसी एक को ही सम्मिलित किया जाएगा। दुर्भाग्य से किसी दम्पती के दो बच्चे विकलांगता से पीडि़त हों तो वे दो पॉलिसी ले सकते हैं। अगर बीमित व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटनावश या स्वत:हो जाती है तो बीमा कम्पनी बीमा राशि के रुपए नेशनल ट्रस्ट को देगी,जो कि बीमा के तहत नॉमिनी भी है। आत्महत्या की स्थिति में बीमा राशि नहीं मिलती। ट्रस्ट कुछ विशेष मामलों में बीमा राशि का पैसा अपने पास ही रखता है, ताकि उसके ब्याज से बच्चे की सही से देखभाल की जा सके। नेशनल ट्रस्ट इन पैसों को उन परिजनों को किस्तों में भी दे सकता है, जो उस बच्चे की देखभाल माता-पिता के गुजरने के बाद करेंगे। एक बार जब इस तरह की योजना के तहत किसी ने फायदा उठा लिया हो, तो वह दोबारा उसे योजना के तहत लाभ नहीं ले सकता। इन योजनाओं का लाभ लेने के लिए माता-पिता या अभिभावक की न्यूनतम आयु 18साल होनी चाहिए और पॉलिसी नवीनीकरण की आयु 59 साल।
कैसे लें यह बीमा?
इन बीमा योजनाओं को लेने के लिए विकलांग बच्चों के माता-पिता या अभिभावक को उन संस्थाओं में आवेदन करना होगा, जो नेशनल ट्रस्ट के तहत पंजीकृत हैं। संस्थाओं का पता और आवेदन फार्म ट्रस्ट की साइट http://www.thenationaltrust.in/ से डाउनलोड किया जा सकता है। ट्रस्ट से पंजीकृत संस्था लोगों के आवेदन करने की प्रक्रिया को पूरा करने से लेकर भविष्य में किसी अनहोनी की स्थिति में क्लेम दिलवाने तक का कार्य करेगी।
आवश्यक प्रपत्र
आवेदन फार्म के साथ आवेदकों को बच्चे का विकलांगता प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, माता-पिता या अभिभवक के साथ विकलांग बच्चे का फोटो और कानूनी अभिभावक होने का प्रमाण संलग्न करना होगा। माता-पिता को अभिभावक प्रमाण पत्र संलग्न करने की आवश्यकता नहीं है। इस आवेदन के साथ किस्त राशि का ट्रस्ट के नाम देय एक चैक भी संलग्र करना होता है। बीमा राशि के भुगतान के समय क्लेम प्रपत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र तथा दुर्घटना मृत्यु होने पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भेजनी होती है। बीमा राशि का भुगतान पांच सप्ताह में हो जाता है।
कितनी होगी किस्त?
इस योजना को भी बाकी बीमा योजनाओं की तरह छोटी उम्र में ही लेने पर ज्यादा लाभ है। निरामय योजना में 250रूपए एक लाख के बीमें पर लिए जाते हैं। फिलहाल बाजाज एलियंस की बीमा स्कीम अस्मिता किन्हीं कारणों से कार्य नहीं कर रही है। अधिक जानकारी के लिए अपने क्षेत्र में बीमा कम्पनी या नेशनल ट्रस्ट के सहयोगियों से सम्पर्क कर सकते हैं।
सम्पर्कद नेशनल ट्रस्ट
ऑटिज्म (आत्मक केन्द्रित), सेरेब्रल पॉल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात), मेंटली रिटार्डिड (मंदबुद्धि) और बहु विकलांगता से ग्रसित लोगों के कल्याण हेतु संस्था।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार।
16-बी, बड़ा बाजार मार्ग, ओल्ड राजेन्द्र नगर,
नई दिल्ली-110060,
फोन: 011-43187878 फैक्स : 011-43187880

या

अर्थ आस्था बस्ती विकास केन्द्र
बालमुकन्द खण्ड, गिरीनगर, कालकाजी, नई दिल्ली-19
फोन नं: 011-26449029, 26227720
टॉल फ्री नं. : 1800-11-6800
e-mail : info@asthaindia.inasthaindia@rediffmail.com
web :    http://www.asthaindia.in/

Saturday, July 23, 2011

माइक्रो इंश्योरेंस के लिए एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी की जरूरत

 पिछले दो-तीन वर्षो में लघु बीमा के क्षेत्र में तेज विस्तार की आवश्यकता को देखकर लगता है कि आगामी एक वर्ष के भीतर देश में लघु बीमा क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी का गठन हो जाएगा। सरकार मानती है कि देश के गरीब तबके तक बीमे का फायदा पहुंचाने के लिए लघु बीमा ही फिलहाल एकमात्र रास्ता है। बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आइआरडीए या इरडा) भी इस प्रस्ताव के पक्ष में है। इरडा के सदस्य आर. कानन के अनुसार माइक्रो इंश्योरेंस क्षेत्र की जरूरतें बिल्कुल अलग किस्म की हैं।  माइक्रो इंश्योरेंस के तहत जिस तरह की योजनाएं ग्राहकों को दी जाती हैं उनकी निगरानी इरडा के मौजूदा प्रावधानों के तहत करना आसान नहीं है, इसीलिए एक अलग नियामक एजेंसी होनी चाहिए। वैकल्पिक व्यवस्था होने तक इरडा ही इस क्षेत्र के मामलों को देखता रहेगा। सूत्रों का कहना है कि बीमा क्षेत्र में निजी और विदेशी कंपनियों के आने के बावजूद देश में माइक्रो इंश्योरेंस के क्षेत्र में उतना तेजी से विस्तार नहीं हुआ है जितना कि अन्य बीमा योजनाओं में। खास तौर पर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले और गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाली जनता को इन योजनाओं का सीधा लाभ उतना ही मिला है जितना सरकार ने अनुदान आदि के जरिए पहुंचाया है। हालांकि केंद्र व राज्य सरकारों ने भी माइक्रो इंश्योरेंस देने वाली कंपनियों को कई तरह से प्रोत्साहित किया है लेकिन कम लाभ और अधिक खर्च के चलते ये कम्पनियां इस क्षेत्र में ज्यादा रूचि नहीं ले रही हैं।
भू-मीत द्वारा चार राज्यों (राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश) में किए गए एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में निजी कम्पनियों के जिला स्तरीय कार्यालयों के अधिकारियों से जब उनकी कम्पनी द्वारा बनाई गई माइक्रो इंश्योरेंस योजनाओं के बारे में पूछा गया तो उनके सभी जवाब एक जैसे थे- ये योजनाएं राज्य मुख्यालय से नियंत्रित होती हैं, मैंने यह कम्पनी अभी जॉइन की है, दरअसल मैं मीडिआ बात करने के लिए अधिकृत नहीं हूं, इसके बारे में आपको पूरी जानकरी का मेल कर देंगे, अभी क्लोजिंग चल रही है, उससे फुर्सत मिलते ही आपको आंकड़े मिल जाएंगे आदि आदि। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक भी अधिकारी अपनी ही कम्पनी द्वारा चलाई जा रही माइक्रो इंश्योरेंस की किसी भी एक योजना का नाम तक नहीं बता सका। नाम नहीं छापने की शर्त के साथ एक प्रतिष्ठित कम्पनी के राज्य स्तरीय अधिकारी ने बताया कि-इन योजनाओं में लाभ बहुत थोड़ा है इसलिए इनमें ऐजेन्ट्स का रूझान नहीं है, नब्बे प्रतिशत एनजीओ चोर हैं वे केवल दिखावे में विश्वास करते हैं और उत्तर भारत में स्वय सहायता समूह किन्हीं अज्ञात वजहों से नाकाम हैं। इसलिए माइक्रो इंश्योरेंस की योजनाएं बन तो सकती हैं पर कामयाब नहीं हो सकती। ऐसा नहीं है कि माइक्रो इंश्योरेंस की राह में अकेली  निजी कम्पनियां ही बाधा हैं, इरडा भी इसमें बराबर का भागीदार है। बीमा क्षेत्र की कंपनियों का मानना है कि इरडा लघु बीमा की जरूरत व महत्त्व को ठीक तरीके से समझ नहीं पा रहा है। उदाहरण के लिए, भारतीय जीवन बीमा निगम ने एक वर्ष पहले एक लघु बीमा योजना का प्रारूप तैयार किया था। जिसके तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को उनकी झोपडिय़ों, मवेशियों से लेकर अन्य सभी संपत्तियों का बहुत ही कम किस्त पर बीमा किया जाना था। एलआइसी ने सरकारी क्षेत्र की चारों साधारण बीमा कंपनियों के साथ मिलकर इस योजना को शुरू करने की योजना बनाई थी। मगर इरडा से इसकी मंजूरी नहीं मिली। इरडा के नियमानुसार जीवन बीमा कंपनी केवल एक ही साधारण बीमा कंपनी के साथ समझौता कर सकती है। जाहिर है कि एलआइसी की उस महती योजना का लाभ ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंचा। ऐसे ही कुछ कारणों से लघु बीमा के लिए अलग नियामक एजेंसी लाने की योजना बनाई जा रही है।

Saturday, July 16, 2011

परीक्षा क्यों नहीं देते पहली कक्षा के छात्र?

भू-मीत के ग्रामीण शिक्षा पर आधारित एक  विगत अंक की तैयारी के दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। देश के लगभग सभी सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा के तीस से पैंतीस प्रतिशत विद्यार्थी मुख्य परीक्षा के दिनों में, स्कूल में तो सशरीर उपस्थित होते हैं पर उपस्थिति पंजिका में वे अनुपस्थित दर्शाए जाते हैं। पहली नजर में यह गोरखधंधा ही लगता है कि बच्चे क आए हैं, उनमें से कुछ ने परीक्षा भी दी है पर परिणाम सारणी में ये सारे बच्चे गैऱ-हाजिर कैसे हैं? इन बच्चों के मां-बाप के लिए भी यह एक अबूझ पहेली है कि आखिर हुआ क्या? चलिए सुलझा लेते हैं गोरख बाबा की इस पहेली को। एक सरकारी निर्देश के अन्तर्गत कक्षा आठ तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जाएगा। दूसरे, कि कक्षा आठ तक  के सभी छात्रों को दोपहर का भोजन स्कूल में ही दिया जाएगा। इन दोनों आदेशों का पहली कक्षा के छात्रों की मुख्य परीक्षा से क्या संबंध है? इस विचित्र पहेली को सुलझाने के लिए आपको याद दिलाना पड़ेगा भू-मीत के शिक्षा विषय पर आधारित अंक का पोषाहार वाला वह लेख, जिसमें बताया जा चुका  है कि पहली कक्षा के एक छात्र के लिए सरकार महीने भर में औसत 25 किलो गेहूं या चावल और उसे पकाने के लिए औसतन 117 रूपए नकद देती है। यह तो आप भी जानते हैं कि 100 ग्राम कच्चे चावल पकने के बाद चार व्यस्क  लोगों के लिए पर्याप्त होते हैं, और सामूहिक रूप से भोजन पकाने पर 117 रूपए भी ज्यादा ही रहते हैं। सारे बच्चे स्कूल में भोजन करते भी नहीं है तो उस मद में बचत अलग से होती है। इस अनाज और पैसे की बचत के लालच में प्रधानाचार्य परीक्षा के दिन तक नए छात्रों के लिए प्रवेश खुला रखते हैं। अब जिन छात्रों को स्कूल आते हुए महज महीना-बीस दिन ही हुए हों और जो ढ़ंग से कलम पकडऩा भी नहीं सीख पाते, उन्हें दूसरी कक्षा के लिए उतीर्ण कैसे किया जा सकता है? नियमानुसार फेल उन्हें किया नहीं जा सकता, पास होने के लायक वे हैं नहीं। कुछ ऐसे जैसे फिल्म मुगले आज़म का यह मशहूर डायलॉग- अनारकली! सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे। इस धर्मसंकट में बलिहारी गुरू आपने रस्ता दिया दिखाय। यानी बीच का रास्ता यह निकाला जाता है कि ये सारे छात्र परीक्षा के दौरान ग़ैर हाजिर रहें। जब परीक्षा दी ही नहीं तो दूसरी कक्षा में वे जा नहीं सकते, फेल वे हुए नहीं, इससे आदेशों की अवाज्ञ भी नहीं हुई। इसे कहते हैं नियम रूपी सांप को बिना लाठी तोड़े मारना। इस मौके पर गालिब का फारसी में लिखा एक शेर याद आ रहा है- मगज़ को न जाने दे बाग में, नाहक खून हो जाएगा परवाने का। अर्थ यह कि मगज़ यानी शहद की मक्खी बाग में जाएगी तो फूलों से शहद और मोम इक्कठा करेगी। मोम से मोमबत्तियां बनेंगी। मोमबत्ती जलेगी तो परवाने (कीट-पतंगे) आएंगे और जल कर मरेंगे। इसलिए शहद मक्खी को बाग में जाने ही न दो, न मोम बनेगा न परवाने का नाहक खून होगा।

Thursday, July 14, 2011

कहीं रद्द न हो जाए बीमा पॉलिसी

रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के चलते अक्सर लोग समय पर बीमे की किस्त देना भूल जाते हैं, या फिर उस समय पास में इतना पैसा नहीं होता कि किस्त भरी जा सके। कभी-कभार जान-बूझकर भी किस्त चुकाने के समय को अनदेखा कर देते हैं और बीमा पॉलिसी में चूक (लैप्स) हो जाती है। पॉलिसी चूकने के बाद न केवल बीमा सुरक्षा राशि प्राप्त करने का अधिकार निरस्त हो जाता है बल्कि आर्थिक क्षति भी होती है। बीमा कंपनी द्वारा तय समय सीमा या रिआयत अवधि के अंदर किस्त का भुगतान नहीं करने पर पॉलिसी रद्द हो जाती है, जिसका सीधा अर्थ है बीमाकर्ता व बीमित व्यक्ति के बीच बीमा अनुबंध का समाप्त होना। तीन साल पुरानी या कम अवधि की यूलिप (युनिट लिक्ड प्लान या शेअर बाजार पर आधारित बीमा योजना) अथवा नियमित योजनाओं में किस्त का सालाना भुगतान करने पर ज्यादातर मामलों में एक माह का अतिरिक्त समय मिलता है, इस दौरान सुरक्षा जारी रहती है तथा किसी भी अनहोनी की दशा में दावे का फायदा भी उत्तराधिकारी को मिलता है। रिआयत अवधि में भी किस्त न भरने पर पॉलिसी समाप्त हो जाती है। सावधि (टर्म), धन-वापसी (मनीबैक) व बन्दोबस्ती (एंडॉवमेंट) सरीखी पारम्परिक योजनाओं में भी एक माह की रिआयत अवधि है।
इरडा द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार पॉलिसी संख्या के लिहाज 18 प्रतिशत व किस्त के लिहाज से 10 प्रतिशत बीमे प्रतिवर्ष समाप्त हो जाते हैं, दूसरी ओर पारम्परिक (ट्रेडिशनल) योजनाओं में यह दर थोड़ी कम किन्तु सावधि (टर्म) योजनाओं में अपेक्षाकृत ज्यादा रही है। किस्त अवधि के लिहाज से 19 प्रतिशत और  पॉलिसी संख्या के लिहाज से 28 प्रतिशत बीमा-पत्र आलोच्य अवधि में निरस्त हुए हैं। चूक दर पेंशन योजनाओं में सबसे कम रही वहीं नॉन-मेडिकल पॉलिसी में मेडिकल सुरक्षा पॉलिसी से ज्यादा चूक हुई है।
गलत विक्रय है मुख्य कारण
जानकारों के अनुसार एजेंट द्वारा गलत विक्रय (मिस-सेलिंग) की वजह से ज्यादातर बीमों में चूक होती है। दरअसल एजेंट व मार्केटिंग टीम ग्राहक को ऐसा उत्पाद बेचने का प्रयास करते हैं जो खरीदार की कमाई से मेल नहीं खाता। परिणामस्वरूप, कुछ समय के बाद उस पॅालिसी के रद्द  होने की स्थिति पैदा हो जाती है। बीमा कंपनियां एजेंट्स को नई पॉलिसियों पर हर साल 20,000 करोड़ रुपये कमीशन के रूप में देती हैं। पॉलिसी के पहले साल के कमीशन पर ज्यादा रकम खर्च करने के पीछे निश्चित रूप से ज्यादा से ज्यादा नया व्यवसाय लाने का गणित होता है।
जरूरत के अनुरूप करवांए बीमा
इसलिए बीमा करवाते समय भविष्य की जरूरतों का आकलन करें । भविष्य की संभावित आवश्यकताओं और खर्चों को ध्यान में रखकर ही पॉलिसी खरीदें। किस्त राशि उतनी ही रखें जिसे आसानी से भरवाई जा सके, साथ ही यह भी ध्यान रखें कि भविष्य में आपकी आर्थिक स्थिति में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं।
एजेंट पर निर्भर न रहें
किस्त भरने के मामले में केवल बीमा एजेंट के ऊपर निर्भर न रहें, यह जिम्मेदारी खुद उठाएं। पते में बदलाव, उत्तराधिकारी का चयन या बदलाव, फंड का चयन या बदलाव, टॉप-अप, ऋण, बीच में राशि लेना, बीमा समाप्त करना आदि कार्य निर्णय जहां तक संभव हो खुद ही लें।
नियमित करें किस्त का भुगतान
बीमा पॉलिसी से लगातार प्यार करते रहिए यानी किस्त का भुगतान नियमित और समय पर करते रहें। किसी वजह से यदि चूक हो भी जाए तो रिआयत अवधि का लाभ उठाते हुए किस्त जरूर भरें। वेतन, बचत योजना, मासिक, तिमाही, छमाही या सालाना किस्त अवधि जो भी हो, उसका ध्यान रखें। किस्त भरने की तारीख को डायरी या कैलेंडर पर लिख कर रखें ताकि भूल न हो।
जाने भुगतान के तरीके
नई तकनीक के सौजन्य से अर्थात क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम, प्रीमियम पॉइंट, मोबाइल एसएमएस, नेट बैंकिंग, एटीएम, आटो डेबिट व चेक पिकअप सेवा जैसे ढ़ेर सारे विकल्पों के होते अब किस्त भरना और भी आसान हो गया है।
बीमा कंपनियां भी कर सकती हैं पहल
बीमे की किस्तों में चूक होने पर बीमाधारक की रकम व सुरक्षा चली जाती है, एजेंट का कमीशन समाप्त हो जाता है और इसका सबसे रोज्यादा असर तो बीमा व्यवसाय की वृद्धि पर पड़ता है जिससे बीमा कंपनी का लाभ भी प्रभावित होता है। इसलिए मुख्य कदम तो बीमा कंपनियों को ही उठाना है। पहले साल का कमीशन अधिक होने की वजह से एजेंट नई पॉलिसियां ही बेचने के इच्छुक रहते हैं, उनकी दिलचस्पी पुरानी पॉलिसियों के चलते रहने में कम हो जाती है। इस वजह से नया व्यवसाय तो बढ़ता जाता है पर पुरानी पालिसियां रद्द होती जाती हैं। अगर बीमा कंपनियां पहले साल का कमीशन घटा दें और पुराने बीमों के जारी रखने पर विशेष प्रोत्साहन राशि दे तो यह समस्या कम हो सकती है। ऐसे ही किस्त जमा होने को सुनिश्चित बनाने व ग्राहक को इसकी याद दिलाने पर भी प्रोत्साहन राशि रखी जा सकती है।

Tuesday, July 12, 2011

कहाँ करें बीमा कम्पनी की शिकायत ?

बीमा कंपनियों के टाल-मटोल वाले रवैये से परेशान और क्लेम के लिए कई महीने गुजरने के बाद भी भुगतान न मिलने पर क्या किया जा सकता है? या फिर किस्त का चेक या भुगतान बीमा कंपनी ने ले लिया पर पॉलिसी जारी न की हो तो क्या करें? ग्राहक सेवा प्रतिनिधि को बार-बार फोन करने और बीमा कंपनी के दफ्तर के चक्कर लगाने के बाद भी समस्या का समाधान न हो तब क्या चारा है? सबसे पहले बीमा कंपनी की संबंधित शाखा में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। ज्यादातर कंपनियां अपने पॉलिसीधारकों को ग्राहक सेवा विभाग में फोन या ई-मेल के जरिए शिकायत करने की सुविधा देती हैं। अगर ग्राहक सेवा विभाग कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिले या समस्या का समाधान न हो तो कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी से संपर्क करना चाहिए। बीमा कंपनी को तीन दिनों के भीतर लिखित में पॉलिसीधारक को उसकी शिकायत दर्ज होने की सूचना देनी होती है। शिकायत के दो हफ्ते के भीतर कंपनी को उसे निपटाना होगा। कंपनी अगर शिकायत को खारिज करती है, तो इसकी वजह के साथ-साथ उसे यह भी बताना होगा कि असंतुष्ट होने की स्थिति में पॉलसीधारक के पास क्या-क्या विकल्प हैं। शिकायत खारिज होने के आठ हफ्ते के भीतर आप अगला कदम नहीं उठाते, तो कंपनी मान लेती है कि मामला बंद हो चुका है। अगर इसके बावजूद भी समस्या का समाधान नहीं होता तो एक ही समाधान है बीमा लोकपाल को लिखित शिकायत करना, जहां से 90 दिनों में ही सभी समस्याओं का समाधान मिल सकता है।  
क्या है लोकपाल?
लोकपाल वह अधिकारी है जो पालिसी धारकों की समस्या के निस्तारण के लिए सरकार द्वारा सामान्यतया बीमा उद्योग, सिविल सेवा या न्यायिक सेवा अधिकारियों में से मनोनीत किए जाते हैं। बीमाधारकों के हितों की रक्षा के लिए 11 नवंबर, 1998 को भारत सरकार द्वारा जारी सूचनापत्र के बाद बीमा लोकपाल संस्थान अस्तित्व में आया। ग्राहकों और बीमा कंपनियों के बीच भरोसा बनाए रखने में इसकी अहम भूमिका है। इसका मुख्य उद्देश्य, बीमाधारकों की शिकायतों का जल्द से जल्द निपटारा करना है, साथ ही उन समस्याओं का भी समाधान करना भी है जो बीमाधारकों की शिकायतों के निपटारे में बाधक हैं। लोकपाल की नियुक्ति के लिए कमेटी के सुझाव के आधार पर प्रशासनिक निकाय आदेश देता है। इस कमेटी में, आइआरडीए (इंश्युरैंस रेग्युलेटरी एंड डिवेल्पमेंट ऑर्थोटी) के अध्यक्ष, एलआइसी (लाइफ इंश्युरैंस कारपोरेशन)और जीआइसी (जनरल इंश्युरैंस कारपोरेशन) के अध्यक्ष तथा केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
लोकपाल के  कार्य
बीमा लोकपाल को दो काम करने होते हैं, पहला ग्राहक की शिकायत का निपटारा और दूसरा बीमा कम्पनी तथा ग्राहक के बीच पंचायत करना। बीमा लोकपाल किसी भी बीमा कंपनी के विरुद्घ शिकायतों को लेने और उन पर विचार करने को अधिकृत है। इसके लिए जरूरी है कि ग्राहक ने पहले अपनी शिकायत संबंधित बीमा कंपनी से की हो और उक्त बीमा कंपनी ने 30 दिनों के भीतर या तो उसका निपटारा न किया हो या निपटारा संतोषजनक न रहा हो। दूसरी बात यह है कि यही शिकायत किसी अदालत, उपभोक्ता अदालत के यहां लम्बित नहीं हो।
क्या हो सकती हैं शिकायतें?
दावे के निपटारे में बीमा कंपनियों द्वारा ढ़ील बरतने या बीमे के लिए दी गई या दी जाने वाली किस्त राशि संबंधी विवाद हो या दावों के निपटारे में विलंब और किस्त लिए जाने के बावजूद किसी तरह का बीमा-दस्तावेज न दिए जाना आदि। लोकपाल, 20 लाख रुपये तक के बीमा संबंधी विवादों के निपटारे के लिए अधिकृत है, तथा इसे तीन महीने में अपना फैसला देना होता है और बीमा कंपनियां उसे मानने के लिए बाध्य भी होती हैं।
कैसे करें शिकायत?
भारत भर में लोकपाल के बारह कार्यालय हैं। जो अपने-अपने क्षेत्राधिकार के आधार पर कार्य करते हैं। शिकायतकर्ता को इनके यहां अपनी शिकायत लिखित रूप में करनी चाहिए। शिकायत, बीमाधारक के कानूनी-वारिसों द्वारा भी दर्ज कराई जा सकती है। लोकपाल के यहां शिकायत दर्ज करवाने में कुछ विशेष सावधानियां रखनी होती हैं जैसे-शिकायतकर्ता द्वारा बीमा कंपनी के समक्ष अपने शिकायत रखे जाने के बाद बीमा कंपनी द्वारा उसका वाद खारिज कर दिया हो या शिकायत मिलने की तारीख से एक महीने तक कोई जवाब नहीं दिया हो या दिए गए जवाबों से शिकायतकर्ता संतुष्टï न हो। लेकिन ध्यान रहे, बीमा कंपनी के जवाब देने के बाद एक साल गुजर जाने पर शिकायत नहीं की जा सकती, उस हालत में शिकायत को अवधिपार मान लिया जाता है। या वह शिकायत किसी न्यायालय या उपभोक्ता मंच में लम्बित नहीं होनी चाहिए।
लोकपाल का फैसला
लोकपाल मामले की गंभीरता और परिस्थितियों को देखते हुए, उचित ही फैसला करता है। निर्णय मामला दर्ज होने के एक महीने के अंदर ही संबंधित शिकायतकर्ता और बीमा कंपनी को भेज दिया जाता है। अगर शिकायतकर्ता, लोकपाल निर्णय और सुझावों से संतुष्टï हो तो उसे सुझाव प्राप्त होने की तारीख से 15 दिनों के अंदर लिखित रूप में लोकपाल को अपनी स्वीकृति देनी होती है। अगर लोकपाल के फैसले से शिकायतकर्ता सहमत नहीं हो तो विवाद उपभोक्ता मंच या अदालत में प्रस्तुत किया जा सकता है।
इसके अलावा बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) के मुफ्त फोन नंबर-155255 पर संपर्क कर सकते हैं या लिखित शिकायत भी दर्ज करवाई जा सकती है। जीवन बीमा, साधारण बीमा में निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के लिए अलग-अलग अधिकारी एवं कार्यक्षेत्र हैं।

साधारण बीमा क्षेत्र की निजी क्षेत्र की कम्पनियों के लिए- 
श्री के. श्रीनिवास, 
सहायक निदेशक
बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण, उपभोक्ता मामलों का विभाग, 
युनाइटिड इंडिया टॉवर, 9वीं मंजिल, 3-5-817, 818 बशीर बाग , हैदराबाद-500 029
e-mail : complaints@irda.gov.in

साधारण बीमा क्षेत्र की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के लिए-
श्री आर. श्रीनिवास, 
विशेष कार्य अधिकारी
बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण, उपभोक्ता मामलों का विभाग, 
युनाइटिड इंडिया टॉवर, 9वां मंजिल, 3-5-817, 818 बशीर बाग , हैदराबाद-500 029
e-mail : complaints@irda.gov.in
 
जीवन बीमा में दोनों क्षेत्रों के लिए- 
श्री टी. व्येकेटश्वराय राव, 
सहायक निदेशक
बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण, उपभोक्ता मामलों का विभाग, 
युनाइटिड इंडिया टॉवर, 9वां मंजिल, 3-5-817, 818 बशीर बाग, हैदराबाद-500 029
e-mail : complaints@irda.gov.in