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Tuesday, September 13, 2011

अनाड़ी हाथों में है जहर का व्यापार

हम सब जानते हैं कि हमारे खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक दुनिया के तेजतरीन जहर होते हैं। इनमें से कुछ तो इतने खतरनाक हैं कि जिन्हें महज सूंघने भर से मौत हो सकती है। इन कीटनाशकों के लगातर इस्तेमाल से कीट-पतंगों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई है, इसलिए इन जहरीली दवाओं को और तेज, और मारक और खतरनाक बनाया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि हम इस जहर को और कितना तेज बनाएंगे, बल्कि यह है  कि इसे बेच कौन रहा है? गांव में इन जानलेवा रसायनों को खाद-बीज के व्यापरियों के अलावा राशन बेचने वाले वो दुकानदार भी बेच रहे हैं, जो इनके घातक परिणामों के बारें में कुछ नहीं जानते। बात यहीं खत्म हो जाए तो भी ठीक नहीं है पर इससे भी चार कदम आगे चली जाए तो साक्षात यमराज के दरवाजे पर दस्तक दे सकती है। कीटनाशक बेचते-बेचते ये लगभग अनपढ़ दुकानदार वैज्ञानिक भी हो जाते हैं, ये किसानों को दो या चार दवाएं मिलाकर छिड़कने की सलाह भी देने लगते हैं। हालांकि दवाइयों के साथ कई भाषाओं में छपे चेतावनी और इस्तेमाल के तरीको के पर्चे आते हैं, लेकिन ये इतने छोटे-छोटे और अस्पष्ठ अक्षरों में छपे होते हैं कि इन्हें पढऩा लगभग नामुमकिन है।
विडम्बना देखिए कि हमारे देश का औषधि नियंत्रण कानून भी इन्सानों और पशुओं की दी जाने वाली उन दवाइयां तक ही सीमित जिन्हें खाकर भी इन्सान तुरंत मरता नहीं है। आश्चर्य यह है कि इन दवाओं को बेचने के लिए फार्मास्सिट की डिग्री लेनी पड़ती है, जबकि घातक जहर बेचने वालों को कृषि विभाग का उपनिदेशक कार्यालय विक्रय लाइसेंस महज कुछ ही रुपयों में जारी कर देता है, और यह भी नहीं पूछता कि विक्रय लाइसेंस लेने वाला कभी स्कूल भी गया है या नहीं? यह सब उसी देश में हो रहा है जहां बिना डॉक्टर की पर्ची दवा बेचना तक जुर्म है। यह अलग बात है कि गावं का झोलाछाप डॉक्टर की दवा की पुडिय़ा में पता नहीं क्या डाल कर खिला रहा है? 
अनाडिय़ों की ये जमात महज गांव तक ही सीमित नहीं है। छोटी-बड़ी मिलाकर 300 से ज्यादा कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियों के पास देश भर में हजारों सेल्समैन हैं जिनमें ज्यादातर कला, वाणिज्य या विज्ञान के स्नातक हैं। विक्रय प्रतिनिधियों की इस फौज को अपने-अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा रसायनिक ज्ञान नहीं है। हालांकि कुछ कम्पनियां इस नौकरी के लिए बीएससी एग्रीकल्चर को प्राथमिकता देती हैं, पर दुर्भाग्य से वे ही लोग इस व्यवसाय को चुनते हैं जिन्हें कोई दूसरा ढ़ंग का काम नहीं मिलता।
सार यह है कि इस बेहद घातक और खतरनाक व्यापार की बागडोर कम से कम निचले स्तर पर तो शत प्रतिशत अनाड़ी हाथों में है। इस कारोबार और हमारी  खेती-बाड़ी के भविष्य का एक सहज अनुमान केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इस जहर को बेचने और इस्तेमाल करने वाले दोनो पक्ष ही नासमझ हैं।

Tuesday, September 6, 2011

खेत से बेदखल किया जाता किसान

आजकल सबसे ज्यादा चर्चा में है उत्तर प्रदेश का कृषि भूमि अधिग्रहण विवाद। इस से विवाद में प्रभावित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले गौतमबुद्धनगर और अलीगढ़ में हुए एक जनमत सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि 48 प्रतिशत किसान अपनी जमीन बेचने के इच्छुक हैं। वे खेती-बाड़ी छोड़ कोई भी और व्यवसाय करना चाहते हैं, उन्हें बस इंतजार है अच्छे दाम देने वाले खरीदार का। इस सर्वेक्षण से पूर्व में हुए नेशनल साम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के सर्वेक्षण को और बल मिलता है, जिसमें 42 प्रतिशत से ज्यादा किसानों ने बेहतर विकल्प मिलने पर खेती-बाड़ी छोडऩे की इच्छा जाहिर की थी। इसका प्रमाण यह भी है कि देश की आय में कृषि का हिस्सा घटकर 14.5 प्रतिशत से भी कम हो गया है। एनएसएसओ के अनुसार खेती से जुड़े एक परिवार की मासिक आय मात्र 2400 रूपए है, ऐसे में यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि इतनी कम आदमनी के बदले किसान अपनी जमीन सुरक्षित रखेंगे।
महज यही एक कारण नहीं है कि किसानों खेतों से दूर हो रहा है। एक और शक्ति भी है जो इस कार्य में किसानों की इच्छा-अनिच्छा के बावजूद इसे बढ़ावा दे रही है। बिल्डर-उद्योगपतियों-राजनेताओं और भूमाफियाओं का जो गठजोड़ हमेशा जमीन हथियाने के अवसरों की तलाश में रहता है। दूसरे रीयल इस्टेट कंपनियां और उनके लाखों दलाल अधिकतम सम्भव भूमि हथियाने के प्रबंध में जुटे हुए हैं। अब उन्हें तीसरे सहयोगी के रूप में अर्थशास्त्री भी मिल गए हैं, जो ग्रामीण आबादी को शहरी इलाकों में स्थानान्तरित करने पर जोर दे रहे हैं। उनका तर्क है कि भूमि लाभ कमाने वाली एक आर्थिक सम्पत्ति है, लेकिन दुर्भाग्य से वह असक्षम लोगों के हाथ में है। उनके आर्थिक विकास विश्लेषन का सार यह है कि किसानों के पास जो थोड़ी-बहुत जमीन बची है, उन्हें उससे भी वंचित कर दिया जाए। हमारी सरकारें भी उनके कन्धे से कन्धा मिलाकर इस षडय़ंत्र में शामिल हैं, जो कहती हैं भूमि का अधिग्रहण अपरिहार्य और अवश्यम्भावी है, क्योंकि आर्थिक विकास के लिए भूमि की जरूरत है। इस सारी अव्यवस्था के बीच एक नया भूमि अधिग्रहण विधेयक लाया जा रहा है। जिसमें शायद पुनर्वास से सम्बंधित उपयुक्त और उन्नतिशील प्रावधानों का समावेश होगा, हो सकता है वह किसानों की चिन्ताओं को दूर करने में कामयाब हो। आर्थिक क्षतिपूर्ति का पैकेज क्या हो, कैसा हो, इसे लेकर आन्तरिक रूप से विचार-मंथन का दौर शुरू हो गया है।
कुछ बातें हैं जिन पर चर्चा किए बिना प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण विधेयक हमें समझ ही नहीं आएगा। जैसे (1)अच्छी उपजाऊ जमीन, जिसे गैर कृषि उद्देश्यों के लिए परिवर्तित करने से पूर्व इस बात का कोई ध्यान ही नहीं रखा गया कि इसका परिणाम क्या होगा? (2)आजतक कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया गया जिससे यह पता लगे कि उद्योगों के लिए कितनी कृषि भूमि की जरूरत है और अब तक कितनी भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है। (3)देश में कुकरमुत्तों की तरह उगी छोटी-छोटी कॉलोनियों का जिक्र छोड़ भी दें तो उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित यमुना एक्सप्रेस वे के तहत 44 हजार हेक्टेयर उपजाऊ कृषि भूमि टाउनशिप, औद्योगिक समूहों, गोल्फ कोर्सेज आदि के लिए अधिग्रहीत की जा रही हैं के बारे में क्या कहेंगे? (4) इस जैसी कितनी योजनाएं हमारी राज्य सरकारों के दिमाग में पनप रहीं है। (5)किसी विशेष उद्देश्य की खातिर कितनी जमीन की जरूरत है। जैसे एक विश्वविद्यालय, स्कूल या निजी हस्पताल स्थापित करने के लिए कितने हजार एकड़ भूमि की जरूरत होगी? यहां सवाल यह नहीं है कि कोई कितनी भी भूमि खरीद सकता है। सवाल यह है कि वह कितनी भूमि खरीद सकने में समर्थ हैं? ऐसा नहीं है कि किसान इस मामले में भोला-भाला है, वह भी बेहतर दाम मिलने पर अपनी भूमि को दोनों हाथों से बेचने के इच्छुक दिखाई देता हैं। उसका तर्क है कि अब जमीन से उसे परिवार पालने लायक आमदनी नहीं होती।
इस विवाद का एक संभावित हल यह हो सकता है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक से ज्यादा हमें किसान आय आयोग का गठन करने पर जोर देना चाहिए। यह आयोग प्रत्यक्ष आय तंत्र के जरिए किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में काम करे जिससे खेती को आगे बढऩे के लिए पीछे से वित्तीय समर्थन मिले और किसान बंजर जमीनों को खेती योग्य भूमि में विकसित कर सके। अमरीका में किसानों को अपनी भूमि के संरक्षण और विकास के लिए हर साल कुछ राशि का भुगतान किया जाता है। जिसके दो फायदे होते हैं। पहला खेती बची रहती है और दूसरा खाद्य सुरक्षा मामले में देश आत्मनिर्भर रहता है। हमें याद रखना होगा कि किसी भी राष्ट्र के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए खाद्य सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक दूसरा उपाय यह भी है कि केन्द्र एवं राज्य सरकारों को आवास नीति एकरूपता लानी होगी, जैसे कालोनियों श आवासिय भवनों को लम्बे-चौड़े भूखण्डों में पसरने देने की बजाय बहुमंजिला भवनों को प्रोत्साहन देना हो सकता है। और तीसरा यह कि ग्रामीण क्षेत्र की अर्धशिक्षित भीड़ जो गांव में रहना नहीं चाहती और शहर में जिनके लिए मनचाहा काम नहीं है , के लिए गावं में मजदूरी के अतिरिक्त काम के अवसर पैदा किए जाएं, न उन्हें मुफ्त में रोटियां तोडऩे की आदत डाली जाए।

Wednesday, August 31, 2011

कैसे बिकता है प्रतिबंधित कीटनाशक?

आपसे बेहतर इस तथ्य को कौन समझ सकता है कि खेती के मामले में जहर पर हमारी निर्भरता कितनी बढ़ चुकि है। फसल उगाने से पहले खेत में जहर डालना शुरू करते हैं तो भण्डारण तक नहीं रूकते। बात यहीं खत्म हो जाती तो गनीमत था, अब तो फल-सब्जियों को पकाने और देर तक ताजा रखने के लिए भी जहर का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। एक आश्चर्यजनक सच्चाई यह भी है कि दुनिया भर में प्रतिबंधित कीटनाशकों को भारत में खुलेआम बेचा और प्रयोग किया जा रहा है। फल-सब्जियों पर इनके प्रयोग से न केवल कैंसर जैसी जान लेवा बीमारियों को सीधे न्योता दिया जा रहा है, बल्कि अल्सर, चर्म रोग, हृदय रोग, रक्तचाप जैसी बीमारी भी तेजी से फैल रही हैं।
फल-सब्जियों पर जहर के प्रयोग को रोकने के लिए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली अब तक 27 से ज्यादा कीटनाशकों पर आंशिक या पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा चुकी है। इसके बावजूद पूरे देश में ऐसे कीटनाशकों की बिक्री बेरोकटोक जारी है। हालांकि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देशभर के कृषि व फल वैज्ञानिकों को इन प्रतिबंधित दवाओं की सूची उपलब्ध करावा दी है। परिषद ने यह जिम्मेवारी कृषि वैज्ञानिकों को सौंपी हे कि वे किसानों को ऐसे कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले नुकसान से अगाह करें।
राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 27 कीटनाशकों व कीटनाशक मिश्रण को जिनका प्रयोग भारत में होता है को प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा दो कीटनाशक ऐसे जिनका भारत में उपयोग प्रतिबंधित कर दिया गया है, पर इनका उत्पादन निर्यात के लिए किया जा सकता है। चार कीटनाशक मिश्रण ऐसे भी हैं जिनके उपयोग, उत्पादन व आयात को भी प्रतिबंधित किया गया है। सात कीटनाशकों को कंपनियों अथवा निर्माताओं द्वारा बाजार तक पहुंचने के पहले ही हानिकारक मानकर वापस ले लिया गया तथा 18 कीटनाशकों का तो निबंधन करने तक से मना कर दिया गया है। इसके अलावा 13 कीटनाशक वो हैं जिन्हें देश में कम इस्तेमाल करने की नसीहत दी गई है।
आपकी सुविधा के लिए उन 27 कीटनाशकों व कीटनाशक मिश्रण की सूची प्रकाशित है जिनके प्रयोग पर देश में प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें एल्ड्रिन, बेंजीन हेक्साक्लोराइड, कैल्शियम साइनाइड, क्लोरडेन, कापर एसीटोरसेनाइट, ब्रोमोक्लोरोप्रोप्रेन, एन्ड्रिन, इथाइल मरकरी क्लोराइड, इथाइल पैराथियान, हेप्टाक्लोर, मेनाजोन, नाइट्रोफेन, पांराक्वेट डाईमिथाइल सल्फेट, पेंटाक्लोरो नाइट्रोबेंजीन, पेंटाक्लोरोकेनोल, फिनायल मरकरी एसिटेट, सोडियम मैथेन अर्सोनेट, टेट्राडिफोन, टांक्साफेन ,एल्डीकार्ब, क्लोरोबंजिलेट, डाइब्रोमाइड, ट्राईक्लोरोएसिटिक एसिड, मेटोक्सारांन, क्लोरोकेनविनकांस है।
आंशिक प्रतिबंधित रसायन -मिथइल पैराथियान दो प्रतिशत धूल या 50 प्रतिशत ईसी फल व सब्जियों पर, मिथाक्सी इथाइल मर्करी क्लोराइड का प्रयोग आलू और गन्ने के बीज के लिए प्रयोग किया जाएगा, शेष पर प्रतिबंध, मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत सब्जियों पर और सोडियम साइनाइड केवल कपास के गूलर के लिए प्रयोग होगा, वह भी विशेषज्ञ की मौजूदगी में। डीटीटी सभी फसलों पर प्रतिबंधित, एल्यूमीनियमफास्फाइड 56 प्रतिशत के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध, आल्डिन बेंजिन हैक्सा क्लोराइड, केल्सियम साइनाइड, क्लोरोडेन, डाइब्रोमा प्रोपेन, इन्डिन 20 ईसी, इथाइल मर्करी क्लोराइड, हप्टा क्लोर, मेनाजोन नाइटोफेन, क्लोरोबेन्जीलेट, केप्टाफाल 80 फीसदी चूर्ण, मैथेमिल 125 प्रतिशत, एल फास्फोमिडान 85 प्रतिशत, कार्बोफ्यूरान 50 प्रतिशत के अलावा लिण्डेन और इण्डोसल्फान पूरी तरह से प्रतिबंधित।
धड़ल्ले से बिक रहे प्रतिबंधित कीटनाशक
कृषि विशेषज्ञों से मिली जानकारी अनुसार बिटाबैक्स नामक दवाई अमेरिका में प्रतिबंधित है और वहां से तैयार हो कर भारत में आ रही है। इसका प्रयोग यहां गेहूं में कीड़ा न लगने के लिए किया जाता है।  प्रतिबंध के बावजूद कुछ रसायनों की बिक्री नाम बदलकर धड़ल्ले से हो रही है। इनमें से कुछ रसायन ऐसे हैं जो तत्काल और कुछ लंबे समय बाद अपना असर दिखाते हैं। जानते हैं उनके टेक्निकल नाम और वो नाम जिससे ये रसायन बाजार में बेचे जा रहे-
1. इथाइल मर्करी क्लोराइड--एगिसान, बैगलाल-6
2. मेथोमिल--रनेट, लैनेट, क्रिनेट
3. कार्बोफयूरॉन--प्यूराडान, अनुक्यूरान, डायफ्यूरॉन, सूमो, प्यूरी
4. फोरेट 10 प्रतिशत दानेदार--घन 10जी, अनुमेट फोरिल, फोरोटाक्स, बुकेर जी, पैराटाक्स, बेज इनमेट, वीरफोर
5. लिण्डेन गामा--लिसटाफ, देवीगामा, लिनडस्ट, केनोडेन, रसायन लिण्डेन, हिलफाल कैल्थेन, फलश कमाण्डो मेगाएडा
6. मिथाइल पैराथियान--पेरासिड 50, थानुमार, मेटासिड, फामिडाल चूर्ण, पैराटॉफ, धानुडाल, क्लोफॉस, क्लोरिसिड
7. मोनो क्रोटोफॉस-- विलकॉस, मोनोसिड, गार्जियन, मोनोधन, बलवान मनोहर, रसायन फॉस, लूफास, मोनोसिल आदि।
क्या कहता है कानून?
भारत सरकार ने प्रतिबंधित व निषिद्ध रसायनों की बिक्री रोकने के लिए सख्त कानून बनाएं हैं। कीटनाशक एक्ट 1968 की धारा 29 के तहत ऐसे रसायन बेचने वालों को दस से पचास हजार रुपये तक का जुर्माना या दो साल की कैद हो सकती है।

Tuesday, August 30, 2011

किस कीमत पर चाहिए फसलें?

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में कीटनाशक  एंडोसल्फान की विक्रय और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों को जारी कर दिए हैं। दुनिया के लगभग 82 देशों में इस पर पूर्ण प्रतिबंध है। एक अकेले एंडोसल्फान की क्या बात करें, तमाम कीटनाशकों का नासमझी भरा प्रयोग जीव-जंतुओं और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हमें ज्यादा कमाई के लिए ज्यादा उत्पादन चाहिए। ज्यादा उत्पादन के लिए हम कितना भी खर्चा कर सकते हैं, जेब में न हो तो कर्ज लेकर  भी कर सकते हैं। हमारे खेत, फसल और किसान पूरी तरह से घातक रसायनों में ही डूबे हुए हैं। हमारे यहां एक हेक्टेयर में 600 से 800 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक तथा 7 से 10 लीटर रासायनिक कीटनाशक छिड़के जा रहे है। रसायनों  का  भारत में औसत उपयोग 94.5 किलो है, जबकि पंजाब 209.60 किलो और आंध्रप्रदेश 219.48 तथा तमिलनाडु 186.68 किलो रसायनों का छिड़काव करते हैं।
दरअसल ये शुरूआत तो 70 के दशक से हरित क्रांति नाम पर हुई, जिसने हमें उन्नत बीज, रासायनिक पदार्थ और ट्रेक्टर-थ्रेशर जैसी मशीन आधारित तकनीकें दी पर भारतीय किसान और सरकार से यह निर्णय करने का अधिकार छीन लिया कि वह कैसे खेती करना चाहते हैं। इस तकनीकि उन्नति ने किसानों को उनकी सालाना आय से चार गुना ज्यादा कर्जदार कर दिया है और उसके खेतों का उपजाऊपन भी छीन लिया है। आज किसान जिस स्थिति में पहुंच गया है उसे खेती का संकटकाल कहा जा सकता है। आज वह पारम्परिक,  कम ऊर्वरक, कम कीटनाशक और कम पानी वाली फसलों को छोड़कर नकद फसलों  के मकडज़ाल में फस गया है, इसका एक प्रमाण तो यह है कि जहां 1991 में किसान पर औसत कर्ज ढाई हजार रूपये था वह आज बढ़कर 35 हजार रूपये के पार जा चुका है।
सवाल यह है कि आखिर हमें किस कीमत पर फसलें चाहिएं? अपनी जान की कीमत पर या बैंक और साहूकारों के यहां खुद को गिरवी रख कर? ईमानदारी भरा जवाब तो यह है कि हमें और हमारे कृषि वैज्ञानिकों तथा खेती के लिए योजनाएं बनाती सरकार किसी को भी नहीं मालूम कि होना क्या चाहिए। कीटनाशकों का इस्तेमाल बिना विकल्पों के छोड़ा नहीं जा सकता और जो विकल्प हैं वे या तो आजमाए हुए नहीं हैं या भरोसे के  लायक नहीं हैं। किसान आज इन स्थितियों से बाहर निकलना भी चाहे तो आर्थिक परेशानियां, सरकारी नीतियां और बाजार का दबाव उसे निकलने नहीं देगा। एक राजस्थानी कहावत की अर्थ यह है कि विधवा तो किसी तरह अपना समय गुजार भी ले पर समाज के दुश्चरित्र लोग उसे ऐसा करने नहीं देते।

-भू-मीत, १५ सितम्बर-१६ अक्तूबर का सम्पादकीय

Friday, August 12, 2011

विकलांग बच्चों के परिजनों हेतु विशेष बीमा योजना


क्या है इस योजनाओं में
ये बीमा योजनाएं केवल उन लोगों के लिए है,जिनके बच्चे विकलांगता के शिकार हैं और जिन्हें जीवन भर विशेष देखभाल की जरूरत पड़ेगी। ऐसे बच्चों के माता-पिता को हमेशा यह चिंता भी सताती रहती है कि उनके बाद इन बच्चों का देखभाल कौन करेगा। ऐसे लोगों के लिए ये बीमा योजनाएं एकदम उपयुक्त है। दरअसल ये सभी ग्रूप बीमा योजनाएं है जिनके तहत ऑटिज्म (आत्मकेन्द्रित), सेरेब्रल पॉल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात), मेंटली रिटार्डिड (मंदबुद्धि) और बहु विकलांगता से ग्रसित बच्चों के माता-पिता, अभिभावक और उनका पालन-पोषण करने वाले लोगों का बीमा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि देश में इस समय इस तरह की विकलांगता से ग्रसित करीब 22लाख लोग हैं। अन्य बीमा कंपनियों के पास भी इस तरह की पॉलिसी उपलब्ध हैं, लेकिन वे नेशनल ट्रस्ट की इन योजनाओं के मुकाबले में काफी महंगी हैं, जिन्हें एक सामान्य व्यक्ति नहीं खरीद सकता।
योजना का लाभ क्या हैं?
अस्मिता योजना के तहत विशेष देखभाल की जरूरत वाले विकलांग बच्चों और उनके माता-पिता या अभिभवकों का एक से दस लाख रुपए का जीवन बीमा किया जाता है। योजना के तहत केवल एक ही व्यक्ति को फायदा मिल सकता है। एक बच्चे के साथ केवल माता-पिता या अभिभवक में से किसी एक को ही सम्मिलित किया जाएगा। दुर्भाग्य से किसी दम्पती के दो बच्चे विकलांगता से पीडि़त हों तो वे दो पॉलिसी ले सकते हैं। अगर बीमित व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटनावश या स्वत:हो जाती है तो बीमा कम्पनी बीमा राशि के रुपए नेशनल ट्रस्ट को देगी,जो कि बीमा के तहत नॉमिनी भी है। आत्महत्या की स्थिति में बीमा राशि नहीं मिलती। ट्रस्ट कुछ विशेष मामलों में बीमा राशि का पैसा अपने पास ही रखता है, ताकि उसके ब्याज से बच्चे की सही से देखभाल की जा सके। नेशनल ट्रस्ट इन पैसों को उन परिजनों को किस्तों में भी दे सकता है, जो उस बच्चे की देखभाल माता-पिता के गुजरने के बाद करेंगे। एक बार जब इस तरह की योजना के तहत किसी ने फायदा उठा लिया हो, तो वह दोबारा उसे योजना के तहत लाभ नहीं ले सकता। इन योजनाओं का लाभ लेने के लिए माता-पिता या अभिभावक की न्यूनतम आयु 18साल होनी चाहिए और पॉलिसी नवीनीकरण की आयु 59 साल।
कैसे लें यह बीमा?
इन बीमा योजनाओं को लेने के लिए विकलांग बच्चों के माता-पिता या अभिभावक को उन संस्थाओं में आवेदन करना होगा, जो नेशनल ट्रस्ट के तहत पंजीकृत हैं। संस्थाओं का पता और आवेदन फार्म ट्रस्ट की साइट http://www.thenationaltrust.in/ से डाउनलोड किया जा सकता है। ट्रस्ट से पंजीकृत संस्था लोगों के आवेदन करने की प्रक्रिया को पूरा करने से लेकर भविष्य में किसी अनहोनी की स्थिति में क्लेम दिलवाने तक का कार्य करेगी।
आवश्यक प्रपत्र
आवेदन फार्म के साथ आवेदकों को बच्चे का विकलांगता प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, माता-पिता या अभिभवक के साथ विकलांग बच्चे का फोटो और कानूनी अभिभावक होने का प्रमाण संलग्न करना होगा। माता-पिता को अभिभावक प्रमाण पत्र संलग्न करने की आवश्यकता नहीं है। इस आवेदन के साथ किस्त राशि का ट्रस्ट के नाम देय एक चैक भी संलग्र करना होता है। बीमा राशि के भुगतान के समय क्लेम प्रपत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र तथा दुर्घटना मृत्यु होने पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भेजनी होती है। बीमा राशि का भुगतान पांच सप्ताह में हो जाता है।
कितनी होगी किस्त?
इस योजना को भी बाकी बीमा योजनाओं की तरह छोटी उम्र में ही लेने पर ज्यादा लाभ है। निरामय योजना में 250रूपए एक लाख के बीमें पर लिए जाते हैं। फिलहाल बाजाज एलियंस की बीमा स्कीम अस्मिता किन्हीं कारणों से कार्य नहीं कर रही है। अधिक जानकारी के लिए अपने क्षेत्र में बीमा कम्पनी या नेशनल ट्रस्ट के सहयोगियों से सम्पर्क कर सकते हैं।
सम्पर्कद नेशनल ट्रस्ट
ऑटिज्म (आत्मक केन्द्रित), सेरेब्रल पॉल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात), मेंटली रिटार्डिड (मंदबुद्धि) और बहु विकलांगता से ग्रसित लोगों के कल्याण हेतु संस्था।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार।
16-बी, बड़ा बाजार मार्ग, ओल्ड राजेन्द्र नगर,
नई दिल्ली-110060,
फोन: 011-43187878 फैक्स : 011-43187880

या

अर्थ आस्था बस्ती विकास केन्द्र
बालमुकन्द खण्ड, गिरीनगर, कालकाजी, नई दिल्ली-19
फोन नं: 011-26449029, 26227720
टॉल फ्री नं. : 1800-11-6800
e-mail : info@asthaindia.inasthaindia@rediffmail.com
web :    http://www.asthaindia.in/

Saturday, July 23, 2011

माइक्रो इंश्योरेंस के लिए एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी की जरूरत

 पिछले दो-तीन वर्षो में लघु बीमा के क्षेत्र में तेज विस्तार की आवश्यकता को देखकर लगता है कि आगामी एक वर्ष के भीतर देश में लघु बीमा क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी का गठन हो जाएगा। सरकार मानती है कि देश के गरीब तबके तक बीमे का फायदा पहुंचाने के लिए लघु बीमा ही फिलहाल एकमात्र रास्ता है। बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आइआरडीए या इरडा) भी इस प्रस्ताव के पक्ष में है। इरडा के सदस्य आर. कानन के अनुसार माइक्रो इंश्योरेंस क्षेत्र की जरूरतें बिल्कुल अलग किस्म की हैं।  माइक्रो इंश्योरेंस के तहत जिस तरह की योजनाएं ग्राहकों को दी जाती हैं उनकी निगरानी इरडा के मौजूदा प्रावधानों के तहत करना आसान नहीं है, इसीलिए एक अलग नियामक एजेंसी होनी चाहिए। वैकल्पिक व्यवस्था होने तक इरडा ही इस क्षेत्र के मामलों को देखता रहेगा। सूत्रों का कहना है कि बीमा क्षेत्र में निजी और विदेशी कंपनियों के आने के बावजूद देश में माइक्रो इंश्योरेंस के क्षेत्र में उतना तेजी से विस्तार नहीं हुआ है जितना कि अन्य बीमा योजनाओं में। खास तौर पर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले और गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाली जनता को इन योजनाओं का सीधा लाभ उतना ही मिला है जितना सरकार ने अनुदान आदि के जरिए पहुंचाया है। हालांकि केंद्र व राज्य सरकारों ने भी माइक्रो इंश्योरेंस देने वाली कंपनियों को कई तरह से प्रोत्साहित किया है लेकिन कम लाभ और अधिक खर्च के चलते ये कम्पनियां इस क्षेत्र में ज्यादा रूचि नहीं ले रही हैं।
भू-मीत द्वारा चार राज्यों (राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश) में किए गए एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में निजी कम्पनियों के जिला स्तरीय कार्यालयों के अधिकारियों से जब उनकी कम्पनी द्वारा बनाई गई माइक्रो इंश्योरेंस योजनाओं के बारे में पूछा गया तो उनके सभी जवाब एक जैसे थे- ये योजनाएं राज्य मुख्यालय से नियंत्रित होती हैं, मैंने यह कम्पनी अभी जॉइन की है, दरअसल मैं मीडिआ बात करने के लिए अधिकृत नहीं हूं, इसके बारे में आपको पूरी जानकरी का मेल कर देंगे, अभी क्लोजिंग चल रही है, उससे फुर्सत मिलते ही आपको आंकड़े मिल जाएंगे आदि आदि। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक भी अधिकारी अपनी ही कम्पनी द्वारा चलाई जा रही माइक्रो इंश्योरेंस की किसी भी एक योजना का नाम तक नहीं बता सका। नाम नहीं छापने की शर्त के साथ एक प्रतिष्ठित कम्पनी के राज्य स्तरीय अधिकारी ने बताया कि-इन योजनाओं में लाभ बहुत थोड़ा है इसलिए इनमें ऐजेन्ट्स का रूझान नहीं है, नब्बे प्रतिशत एनजीओ चोर हैं वे केवल दिखावे में विश्वास करते हैं और उत्तर भारत में स्वय सहायता समूह किन्हीं अज्ञात वजहों से नाकाम हैं। इसलिए माइक्रो इंश्योरेंस की योजनाएं बन तो सकती हैं पर कामयाब नहीं हो सकती। ऐसा नहीं है कि माइक्रो इंश्योरेंस की राह में अकेली  निजी कम्पनियां ही बाधा हैं, इरडा भी इसमें बराबर का भागीदार है। बीमा क्षेत्र की कंपनियों का मानना है कि इरडा लघु बीमा की जरूरत व महत्त्व को ठीक तरीके से समझ नहीं पा रहा है। उदाहरण के लिए, भारतीय जीवन बीमा निगम ने एक वर्ष पहले एक लघु बीमा योजना का प्रारूप तैयार किया था। जिसके तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को उनकी झोपडिय़ों, मवेशियों से लेकर अन्य सभी संपत्तियों का बहुत ही कम किस्त पर बीमा किया जाना था। एलआइसी ने सरकारी क्षेत्र की चारों साधारण बीमा कंपनियों के साथ मिलकर इस योजना को शुरू करने की योजना बनाई थी। मगर इरडा से इसकी मंजूरी नहीं मिली। इरडा के नियमानुसार जीवन बीमा कंपनी केवल एक ही साधारण बीमा कंपनी के साथ समझौता कर सकती है। जाहिर है कि एलआइसी की उस महती योजना का लाभ ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंचा। ऐसे ही कुछ कारणों से लघु बीमा के लिए अलग नियामक एजेंसी लाने की योजना बनाई जा रही है।

Saturday, July 16, 2011

परीक्षा क्यों नहीं देते पहली कक्षा के छात्र?

भू-मीत के ग्रामीण शिक्षा पर आधारित एक  विगत अंक की तैयारी के दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। देश के लगभग सभी सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा के तीस से पैंतीस प्रतिशत विद्यार्थी मुख्य परीक्षा के दिनों में, स्कूल में तो सशरीर उपस्थित होते हैं पर उपस्थिति पंजिका में वे अनुपस्थित दर्शाए जाते हैं। पहली नजर में यह गोरखधंधा ही लगता है कि बच्चे क आए हैं, उनमें से कुछ ने परीक्षा भी दी है पर परिणाम सारणी में ये सारे बच्चे गैऱ-हाजिर कैसे हैं? इन बच्चों के मां-बाप के लिए भी यह एक अबूझ पहेली है कि आखिर हुआ क्या? चलिए सुलझा लेते हैं गोरख बाबा की इस पहेली को। एक सरकारी निर्देश के अन्तर्गत कक्षा आठ तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जाएगा। दूसरे, कि कक्षा आठ तक  के सभी छात्रों को दोपहर का भोजन स्कूल में ही दिया जाएगा। इन दोनों आदेशों का पहली कक्षा के छात्रों की मुख्य परीक्षा से क्या संबंध है? इस विचित्र पहेली को सुलझाने के लिए आपको याद दिलाना पड़ेगा भू-मीत के शिक्षा विषय पर आधारित अंक का पोषाहार वाला वह लेख, जिसमें बताया जा चुका  है कि पहली कक्षा के एक छात्र के लिए सरकार महीने भर में औसत 25 किलो गेहूं या चावल और उसे पकाने के लिए औसतन 117 रूपए नकद देती है। यह तो आप भी जानते हैं कि 100 ग्राम कच्चे चावल पकने के बाद चार व्यस्क  लोगों के लिए पर्याप्त होते हैं, और सामूहिक रूप से भोजन पकाने पर 117 रूपए भी ज्यादा ही रहते हैं। सारे बच्चे स्कूल में भोजन करते भी नहीं है तो उस मद में बचत अलग से होती है। इस अनाज और पैसे की बचत के लालच में प्रधानाचार्य परीक्षा के दिन तक नए छात्रों के लिए प्रवेश खुला रखते हैं। अब जिन छात्रों को स्कूल आते हुए महज महीना-बीस दिन ही हुए हों और जो ढ़ंग से कलम पकडऩा भी नहीं सीख पाते, उन्हें दूसरी कक्षा के लिए उतीर्ण कैसे किया जा सकता है? नियमानुसार फेल उन्हें किया नहीं जा सकता, पास होने के लायक वे हैं नहीं। कुछ ऐसे जैसे फिल्म मुगले आज़म का यह मशहूर डायलॉग- अनारकली! सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे। इस धर्मसंकट में बलिहारी गुरू आपने रस्ता दिया दिखाय। यानी बीच का रास्ता यह निकाला जाता है कि ये सारे छात्र परीक्षा के दौरान ग़ैर हाजिर रहें। जब परीक्षा दी ही नहीं तो दूसरी कक्षा में वे जा नहीं सकते, फेल वे हुए नहीं, इससे आदेशों की अवाज्ञ भी नहीं हुई। इसे कहते हैं नियम रूपी सांप को बिना लाठी तोड़े मारना। इस मौके पर गालिब का फारसी में लिखा एक शेर याद आ रहा है- मगज़ को न जाने दे बाग में, नाहक खून हो जाएगा परवाने का। अर्थ यह कि मगज़ यानी शहद की मक्खी बाग में जाएगी तो फूलों से शहद और मोम इक्कठा करेगी। मोम से मोमबत्तियां बनेंगी। मोमबत्ती जलेगी तो परवाने (कीट-पतंगे) आएंगे और जल कर मरेंगे। इसलिए शहद मक्खी को बाग में जाने ही न दो, न मोम बनेगा न परवाने का नाहक खून होगा।