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Tuesday, October 30, 2012

सहकारिता कल, आज और कल

कल्पना करें आज से पच्चीस हजार वर्ष पहले की, जब आदमी मुख्यतया शिकार पर ही जीवन यापन करता था जब जंगल में उससे कहीं अधिक सशक्त जानवरों का राज्य था, तब यह दुर्बल सा प्राणी बिना हथियारों के मात्र लाठी और पत्थर की सहायता से अपनी रक्षा कैसे पाया? और कैसे उन सशक्त जानवरों को अपने वश में किया? यदि शारीरिक रूप से दुर्बल मानव जाति इन भयंकर जीव-जंतुओं के रहते अपनी रक्षा मात्र लाठी तथा पत्थरों से कर सकी थी, तब इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि यह 'सहयोग' या सहकार से ही हुआ होगा। सहयोग के तत्काल प्रतिदान की अपेक्षा नहीं होती सिवाय इसके कि 'शुभ कामनाएं' मिलें। किन्तु उस काल के आखेट में सहयोग में भी कुछ स्पष्ट 'लेन-देन' की भावना या मान्यता रही होगी, जैसे कि शिकार का मांस सभी में बँटता होगा। वास्तव में वह सहयोग अलिखित सहकार ही था, लिखित अनुबन्ध तो उन दिनों होते नहीं थे।

यूरोप के नवजागरण काल यानी सोलहवीं शती में उद्योगपतियों या व्यवासाइयों के 'गिल्ड' हुआ करते थे जो उद्योग या व्यापार के नियम बनाते और उनका सभी घटकों में पालन होते भी देखते थे; किन्तु वह आधुनिक अर्थों में 'सहकारिता' नहीं थी। अधिकांश विद्वान यह कहते हैं कि सहकारिता तो ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति पर प्रतिक्रिया की बीसवीं सदी की उपज है। किन्तु यह सुखद तथ्य है कि सहकारिता के विषय में विश्व में सर्वप्रथम श्रमिकों के संगठन, उद्योगपतियों या व्यवसाइयों, तथा गिल्ड, और सहकारिता के नियमों की जानकारी चाणक्य (330 ईसा पूर्व) द्वारा रचित अर्थशास्त्र (आर्थिक शास्त्र नहीं, वरन शासन संहिता) में मिलती है और वह भी पर्याप्त विकसित रूप में। शासन निजी तथा शासकीय उद्योगों के कार्यों के सुचालन में उपयुक्त नियमों के बनाने तथा कार्यान्वयन में सक्रिय योगदान करता था।
सहयोग तथा सहकार
सहयोग तथा सहकार में मुख्य अंतर यह है कि, बिना सहयोग की भावना के सहकार नहीं हो सकता। दूसरा यह कि सहयोग अनौपचारिक है, और सहकार औपचारिक जिसमें लिखित नियम या अनुबन्ध भी होते हैं। तीसरा यह कि सहयोग में करने वाले को किसी अन्य लाभ की अपेक्षा नहीं होती, जबकि सहकार में लाभ या हानि बाँटी जाती है। चौथा अंतर है सहयोग करने वाले पक्षों के बीच घनिष्ठता तथा मैत्री होती है, यद्यपि यह अनिवार्य नहीं, जबकि सहकार में मैत्री की भावना आवश्यक है। पांचवा यह कि सहकार में साझा व्यक्तियों के उद्देश्य तथा कार्य विधि में सहमति होना आवश्यक है जबकि सहयोग में सहमति का होना आवश्यक नहीं है।
सहकारिता आज
आजकल अनेक विशाल उद्योग, दूकानें, बैंक आदि सहकारिता के आधार पर चल रहे हैं, अधिकांशत:, इनके सदस्य उपभोक्ता होते हैं। विदेशों में यह बहुदा सफल हैं किन्तु एशिया में उतने कामयाब नहीं हैं। सहकारिता को इस देश में भी वांछनीय महत्त्व या सम्मान नहीं मिलता। सोचने की बात है कि सहकारिता की इस नगण्य प्रगति में हमारा चरित्र ही प्रमुख कारण है या रूसी सोच पर आधारित समाजवाद(यूनिअनिजम) या फिर अधकचरा पूँजीवाद? जब विश्व में इसके तहत खरबों डालर का कार्य सुचारु और व्यवस्थित रूप से चल रहा है, तब हम भी समस्याओं के हल निकाल सकते हैं, किन्तु वे मूलभूत विचार में कमी के कारण फिर भी सीमित रहेंगे। सहकारिता के कार्य में कार्मिकों में दक्षता के साथ उपरोक्त मूल्य, यथा, सच्चाई, सेवाभाव, कर्तव्यनिष्ठा आदि अत्यंत आवश्यक हैं। यह चरित्र का विषय तो है ही, किन्तु साथ ही व्यक्ति की समग्र जीवन दृष्टि का भोगवादी न होकर 'त्यागमय-भोगवादी' होना भी आवश्यक है।
सहकारिता का भविष्य
सहाकारिता की मानवीय दृष्टि न तो आवश्यक रूप से पूँजीवादी है और न साम्यवादी। जैसा कि ऊपर लिखा गया है, यदि इसमें सहकारी संस्था का प्रमुख ध्येय 'लाभ कमाना' नहीं है। दूसरे यह केवल मजदूरों या किसी एक वर्ग का ही हित नहीं देखती, और न उनके द्वारा राज्य संचालन की माँग करती है। पूँजीवाद में पैसे की गुलामी है, इसमें शक्ति का सदुपयोग (!) धन बनाने के लिये किया जाता है, जो अनंत और स्वीकार्य भ्रष्टाचार को जन्म देता है और जनतंत्र को नपुंसक बनाता है। और साम्यवाद में वैचारिक तथा संकेन्द्रित सत्ता की गुलामी है और इनका काडर- माफिय़ा नागरिकों पर हावी रहता है और दोनों ही दर्शन भोगवादी हैं। देखा जाए तो पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही सच्चे अर्थों में मानववादी नहीं हैं। सहकारिता तो, पूँजीपति हों या मजदूर हों, सदस्यों सहित सभी समाज का हित देखती है। अत: इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सन 2002 में संयुक्त राष्ट्र संघ की निर्विशेष सभा में यह स्वीकारा गया कि सहकारिता आर्थिक समृद्धि तथा समाजिक न्याय एवं विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है, और उसने विश्व के देशों से अनुरोध किया कि वे सहकारिता के द्वारा समाज की आर्थिक, सामाजिक उन्नति करें। इसके महत्त्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2012 को सहकारिता का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है।
सहकारिता में कुछ मात्रा में मानव हित की भावना सन्निहित है, किन्तु इसमें क्न्ज़्यूमैरिजम अर्थात उपभोक्तावाद का विरोध सीमित ही है- जो मात्र मानव की सुरक्षा तक के प्रकृति संरक्षण तक ही सीमित है, सम्पूर्ण प्रकृति का संरक्षण नहीं। दूसरे पश्चिम की सुख की अवधारणा में भोग के लिये अतीव उत्कण्ठा, तथा आतुरता ही परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जीवन के चरम लक्ष्य हैं। भारतीय दर्शन तो समग्र मानव जाति, प्रकृति सहित समग्र विश्व के लिये सुख की कामना करता है- सर्वे भवन्तु सुखिन: और उसके सुख की अवधारणा में भोग की उत्कण्ठा नहीं, वरन भोग पर नियंत्रण है, भोग के परे का आनंद उसका चरम लक्ष्य है। इसके लिये सहकारिता के मूल्यों में हम ईशावास्य उपनिषद के मंत्र के इस मूल्य 'त्यक्तेन भुन्जीथा:' अर्थात 'भोगवाद को छोड़कर त्यागमय भोग' अपनाना होगा।

विश्व मोहन तिवारी
सेवा-निवृत एअर वाइस मार्शल, नोएडा-201 301

Monday, October 29, 2012

सत्ता का सोपान बनी सहकारिता

माना जाता है कि सहकारिता देश में सदियों से चली आ रही संयुक्त परिवार प्रणाली के सिद्धातों पर आधारित है। चाहे वर्तमान में सहकारिता की नींव रहे संयुक्त परिवार न रहे हों पर सहकारिता अभी जिन्दा है। यह अलग बात है कि आज सहकारिता के अर्थ और संदर्भ दोनों बदल चुके हैं।  आजादी के बाद से ही देश में सहकारिता का स्थान व्यक्तिवादिता लेने लगी। जिसका परिणाम यह हुआ कि सहयोग का स्थान प्रतिस्पर्धा ले लिया, जिसका असर किसानों एवं गरीब लोगों की स्थिति पर भी साफ नजर आने लगा।
हो सकता है 19 वीं सदी के आरंभ में जब सहकारिता की नींव रखी गई तब शायद व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की आर्थिक प्रणालियों में पाए जाने वाले दोषों का निवारण करने का उपाय इसमें शामिल रहे हों। दरअसल सहकारिता इन दोनों के बीच की स्थिति है। 1915 में गठित मैकलगेन समिति के अनुसार, सहकारिता का सिद्धांत यह है कि- एक अकेला साधनहीन व्यक्ति भी अपने स्तर के व्यक्तियों का संगठन बनाकर, एक दूसरे के सहयोग, नैतिक विकास व पारस्परिक समर्थन से अपनी कार्यक्षमता के अनुसार, धनवान, शक्तिशाली व साधन संपन्न व्यक्तियों को उपलब्ध सभी भौतिक लाभ समान स्तर पर प्राप्त कर सकता है। लेकिन, सहकारिता के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके मूल स्वरूप के सिद्धांत में नैतिक विकास और परस्पर सहयोग की भावना सिरे से गायब हैं। 
अकसर ऐसे समाचार मिल जाते हैं कि अमुक सहकारी बैंक या सहकारी मिल बंदरबांट या घोटाले की वजह से बंद हो रही है। सहकारी समितियों के कामकाज, उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक घुसपैठ के कारण सहकारिता के मूल स्वरूप पर मंडराते खतरे पर निरंतर उठते सवालों से जाहिर होता है कि किस तरह से प्रभावशाली लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इन जनसंस्थाओं पर तानाशाहीपूर्वक कब्जा कर जनता को उनके अधिकारों से बेदखल कर रखा है। महाराष्ट्र में शरद पवार और गोपीनाथ मुंडे जैसे राजनीतिज्ञ चीनी सहकारी मिलों के जरिए अपनी राजनीति चमकाने में सफल हुए हैं।
एक समय था सहकारिता के कारण गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के किसानों को एक नई दिशा मिली और उनके लिए तरक्की की राह प्रशस्त हो सकी। किन्तु धीरे-धीरे महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के कारण बड़ी जोत वाले किसानों का दबदबा सहकारी मिलों पर बढ़ता चला गया और उनके नियंत्रात्मक ढांचों में बदलाव आने लगे। अब शुगर फैक्ट्रियों के संचालक मंडल के चुनावों में धन महत्त्वपूर्ण कारक बनता जा रहा है। धनाढय़ एवं शक्तिशाली किसान अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष जैसे पदों को हथियाने लगे हैं और अधिसंख्यक आम सदस्य किसानों के अधिकार नाममात्र के रह गए हैं। अगर कोई इनके सामने खड़ा होने की जुरअत कर भी ले तो उन्हें प्रबंधकों के गुस्से का शिकार बनना पड़ता है। ऐसे किसानों को सबक सिखाने के लिए उनके खेतों से गन्ना नहीं खरीदा जाता, पानी एवं बिजली के कनेक्शन कटवा दिये जाते हैं, उधार पर रोक लगा दी जाती है। सवाल उठता है कि इन हालात में सहकारी संस्थानों की क्या प्रासंगिकता रह जाती है? आधिकारिक जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा सहकारी संस्थान नहीं है, जिस पर राजनीतिज्ञों का नियंत्रण न हो। वहां की 5 प्रतिशत चीनी मिलों पर भारतीय जनता पार्टी, 35 प्रतिशत पर कांग्रेस और शेष 60 प्रतिशत पर राष्ट्रवादी कांग्रेस का कब्जा है। 
कुल मिला कर देश के सभी राज्यों में सहकारी संस्थान राजनेताओं की सत्ता की सीढ़ी बने हुए हैं। यह अलग बात है कि उत्तर भारत में ये संस्थाएं तीसरे-चौथे दर्जे के नेताओं की शरण-स्थली बनी हुई हैं। भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले और अर्थशास्त्री डा. प्रदीप आपटे जैसे लोग इस तरह के सहकारी संस्थानों की दशा में सुधार हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि आम लोग सहकारी संस्थाओं के सदस्य तो हैं, लेकिन सिवाय मताधिकार के उनके पास कोई और अधिकार नहीं है। व्यावसायिक तथ्यों की यहां हमेशा अवहेलना हुई है। बैकुण्ठ मेहता नैशनल कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूट, पुणे से सम्बद्ध एस.पी. भोंसले कहते हैं कि सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनाव कामकाज में बाधा पहुंचाते हैं और उन पर जमकर दलगत राजनीति (पार्टी पॉलीटिक्स) बुरी तरह हावी रहती है। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा में 80 प्रतिशत लोग ऐसे मंत्री हैं, जो किसी न किसी रूप में सहकारी समितियों से जुड़े हुए हैं। जबकि गोआ विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डा. पद्माकर दुभाषी कहते हैं कि- सहकारी संस्थाओं में लोकतंत्र की जगह परिवारतंत्र का दौर है।

Sunday, October 28, 2012

सहकारिता का भविष्य

गुजरात और कुछ हद तक महाराष्ट्र को छोड़कर समूचे उत्तर भारत में सहकारिता आन्दोलन पर नजर डालें तो सहकारिता का अर्थ कुछ और ही दिखता है। बिहार और मध्यप्रदेश से लेकर हरियाणा, राजस्थान और पंजाब तक फैली आखिरी सांस लेती चीनी, रूई और तेल मिलें, लगातार बंद होते सहकारी बाजार और करोड़ों का घाटा देते सहकारी बैंक ऐसे लगते हैं जैसे वर्षों पहले मर चुकी सहकारिता के मजार हों। इन सबके बावजूद दिल्ली के सबसे मंहगे इलाके सीरी फोर्ट में एन.सी.डी.सी., एन.सी.यू.आई. जैसे दो दर्जन कार्यालय पूरी शानो-शौकत से पता नहीं किस वजह से खड़े हैं। सहकारिता की ये ऊंची-ऊंची इमारतें शायद इस बात की गवाह हैं कि नेता और अफसर न होते तो सरकारी मदद पर जिन्दा रहने वाली सहकारिता कभी भी इतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंच जाती।
उत्तर भारत की सहकारिता को अगर नेताओं और अधिकारियों की सहकारिता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। किसी जिले के छोटे से सहकारी बैंक में भी अगर निदेशक का पद मिल गया तो उनकी सात पीढिय़ों के तक के वारे-न्यारे हो जाते हैं। घाटा होता है तो राहत पैकेज देने के लिए सरकार तैयार बैठी है। यही वजह है कि हमारे सभी नेताओं को सहकारिता में टांग फसाना बहुत ज्यादा पसंद है। एक बार कोई पद मिल जाए तो उसके बाद किसी भी चुनाव में हार-जीत की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं रहता। दफ्तर मिला हुआ है, ए.सी. लगा हुआ है, गाडिय़ां दौड़ रही हैं और भत्ते पक रह हैं। यही वजह है कि सहकारिता भ्रष्ट नेताओं की नर्सरी बनी हुई है। भले ही इसमें लिज्जत उद्योग जैसी ईमानदारी और कार्यकुशलता हो न हो, उसके पापड़ जैसा स्वाद जरूर है।
इस बात की ताइद तो इफको के प्रबंध निदेशक उदयशंकर अवस्थी भी करते हैं, उनका कहना है कि- सहकारिता में अभी भी 19 वीं सदी के व्यापार मॉडल का पालन हो रहा है, जिसे कचरा-पेटी में डालने की जरूरत है। आज के युग में रुपए की अस्थिरता, बैंक ऋण नीति, अस्थिर कमोडिटी कीमतें, किसानों के लिए नवीन उत्पाद खरीदना आदि अनेक चुनौतियों के होते केवल सामरिक खरीदी और अत्याधुनिक योजना से ही कोई सहकारी संस्थान लाभ के अनुपात को बनाए रखने में सफल हो सकता है।

Friday, September 14, 2012

अनाड़ी हाथों में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं

आजादी के 65 साल बाद भी देश ऐसे डॉक्टरों से भरा पड़ा जिन्हें बोलचाल की भाषा में आरएमपी या झोलाछाप कह कर बुलाते हैं। ये लोग सिर्फ गाँवों में ही नहीं देश और राज्यों की राजधानियों तक में अपनी दुकानें सजा कर बैठे हैं, और विभिन्न पैथियों से इलाज के नाम पर लोगों के जीवन से खेल रहे हैं। कभी-कभार इनके खिलाफ अभियान चलाया जाता है तो ये कुछ समय तक अपनी दुकान बंद कर देते हैं, और मौका मिलते ही फिर शुरू हो जाते हैं।
क्यों चलती है इनकी दुकान?
चूंकि देश में योग्य एवं प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी है, और जो हैं वे गांवों में जाना नहीं चाहते। इसका फायदा ये तथा-कथित डॉक्टर उठाते हैं। देश में इस तरह के डॉक्टरों को पैदा करने वाले संस्थानों की भी कमी नहीं है। देश के हर राज्य में इस तरह के संस्थान हैं, धडल्ले से डिग्री और प्रमाणपत्र जारी करने की अपनी दुकानदारी चलाते हैं। हालांकि न तो डिग्री प्रदान करने वाले इन संस्थानों की कोई अहमियत है और न इन डिग्रियों की, क्योंकि ये संस्थान कहीं से भी मान्यता प्राप्त नहीं हैं।
किन बीमारियों का इलाज करते हैं ये डॉक्टर?
इस व्यसाय में दो तरह के डॉक्टर हैं। पहले वे जो गावों में रहकर हर छोटी-बड़ी बीमारी का इलाज करते हैं और शहर के बड़े डॉक्टरों के कमीशन ऐजेन्ट हैं। दूसरे वे जिनके आपने अकसर ऐसे विज्ञापन देखे होंगे जिनमें कई सारी बीमारियों का सौ प्रतिशत गारण्टी से इलाज का दावा होता है। आपमें से कुछ लोग उन पर यकीन भी कर लेते हैं। आइए जानते हैं कि वो कौनसी बीमारियां हैं जिनका इलाज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास नहीं किसी हकीम, वैद्य बाबा या झोलाझाप डॉक्टर के पास है। इस तरह के लोग जिन बीमारियों को ठीक करने का दावा करते हैं, उन्हें सुविधा के लिए चार श्रेणियों में बांट लेते हैं। पहली श्रेणी में वह लाइलाज बीमारियां आती हैं जिनका अब तक विज्ञान से कोई पक्का इलाज नहीं ढंूढ़ा है जैसे- कैंसर, ऐडस, गंजापन, छोटा कद, कुछ तरह के सफेद दाग, स्थाई विकलांगता और कुछ तरह के मानसिक रोग हैं। दूसरी श्रेणी में वह बीमारियां हैं जिनका इलाज या तो मंहगा है या सिर्फ ऑपरेशन से ही ठीक हो सकती हैं जैसे- पित्ते की पथरी, घुटने और जोडों का दर्द, मोटाप या दूबलापन, बवासीर, बढ़ा हुआ गूदूद और कुछ तरह की गांठें आदि। तीसरी श्रेणी में वह बीमारियां है जो समय के साथ खुद व खुद ठीक हो जाती हैं जैसे पीलिया, कील, मुहासे, झाइयां और कुछ तरह का लकवा और चौथी तथा अंतिम श्रेणी में आने वाली बीमारियां मदार्ना कमजोरी या यौन रोगों से संबंधित होती हैं। विडंबना है कि जो लाइलाज बीमारी अच्छे-अच्छे डॉक्टरों के उपचार से ठीक नहीं हुई और जिन्हें डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, ऐसे लोग इन आकर्षक विज्ञापनों के जाल में फंस जाते हैं। यह इलाज करवाते समय हमारी सोच यह होती है कि जब हजारों रुपए खर्च करने पर भी बीमारी ठीक नहीं हुई तो कुछ रुपये और सही।
कैसी-कैसी डिग्रियाँ
पांचवी, सातवीं या दसवीं फेल ये डॉक्टर अपने नाम के आगे आरएमपी, बीएमपी, बीएएमएस, डीएचएमएस, डीएमयू, बीएससी, एसआइएमएस (सिम्स), एमआइएमएस (मिम्स) और यहां तक कि अपने नाम के आगे एफआरसीएस तक लिखने से गुरेज नहीं करते। ये झोलाछाप एमबीबीएस (एएम) यानी अन्तरनेटिव मेडिसीन में डिग्री अपने बोर्ड पर धड़ल्ले से लिखते हैं। कई चिकित्सक तो ऐसे हैं जो अपने नाम के आगे डीएम, एएससीएमई, एएपीएमई (फिजिशियन एण्ड सर्जन) लिखने के साथ ही धड़ल्ले से आपरेशन तक करते हैं। इन चिकित्सकों की कई पीढ़ियां इस पेशे में लगी है। यदि इन चिकित्सकों से इन भारी-भरकम डिग्रियों का अर्थ पूछ लिया जाए तो कई रोचक जवाब मिलते हैं और कुछ तो बगलें झांकने लगते हैं। जानकरी के लिए बतादें कि सिम्स व मिम्स पत्रिकाओं के नाम हैं जिसकी इन फर्जी डॉक्टरों ने वार्षिक सदस्यता ले कर अपनी डिग्री में शामिल कर लिया है। बीएएमएस को ये लोग बैचलर ऑफ मेडिसिन ऐंड बैचलर ऑफ सर्जरी बताते हैं जो एक आयुर्वेदिक डाक्टरों की डिग्री है। अपने नाम के आगे आरएमपी लिखने वाले डॉक्टर इस डिग्री की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। कोई रुरल मेडिकल प्रैक्टिशनर, कोई रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर तो कई ने इसे रीयल मेडिकल प्रैक्टिशनर कहते हैं तो कुछ आरएलडी डिग्रीधारी भी हैं, जो खुद को रुरल एलोपैथ डाक्टर बताते हैं। एफ.आर.सी.एस. (फैलो ऑफ रायल कालेज ऑफ सर्जन्स)एक मानद उपाधि है जो सर्जरी के अलावा समाजसेवा आदि के क्षेत्र में इंगलैण्ड या आयरलैण्ड के रायल कालेज ऑफ सर्जन्स द्वारा दी जाती है। रायल कालेज 1994 में मदर टेरेसा, 1995 में नेल्सन मंडेला और अमेरीका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर को भी एफ.आर.सी.एस. की मानद उपाधि दे चुका है।
खुद रहना होगा सावधान
कल्पना की जा सकती है कि जब इंसान की सेहत ऐसे नीम-हकीमों के हाथ में हो, तो उसका क्या हश्र होगा। ये झोलाछाप डॉक्टर अनाधिकृत रूप से और बिना किसी मान्य डिग्री के ग्रामीण अंचलों में अपनी डिस्पेंसरी या क्लिनिक चला रहे हैं जब कोई केस बिगड़ जाता है तो उसे शहर के किसी निजी अस्पताल में छोड़ आते हैं, जहां से इन्हें मोटा कमीशन मिलता है। देश के हर छोटे बड़े गांव में ऐसे फर्जी डॉक्टरों की भरमार है जो कि अनाधिकृत रूप से एलोपैथिक दवाएं लिखकर जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। दंत चिकित्सक के क्षेत्र में तो सड़कछाप डॉक्टरों की कमी नहीं है। वे सड़क पर तंबू लगाकर लोगों के दांत उखाड़ने से लेकर नकली बत्तीसी बनाने तक का काम करते हैं। पायरिया और अन्य दंत रोगों का शर्तिया इलाज करने वाले इन कारीगरों के पास न तो पर्याप्त उचित औजार ही होते हैं और न ही दक्षता। इनकी गिरफ्त में आए व्यक्ति संक्रमण के शिकार होकर उसकी पीड़ा भोगते हैं। ताकत और जवानी को बेचने वाले भी कम नहीं है। हस्तमैथुन, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष आदि के बारे में फैली भ्रांतियों की वजह से इनकी दुकानदारी खूब चलती हैं। आप शायद ही जानते हों कि स्तंभन शक्ति बढ़ाने और कद लम्बा करने के लिए दी जाने वाली दवा सेहत को कितना नुकसान पहुंचाती है। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है या कोई गंभीर शिकायत होती है, तो डॉक्टरों और उसकी डिग्री की खोज खबर की जाती है, जिससे पता चलता है कि न सिर्फ डॉक्टर नकली था उसकी डिग्री भी फर्जी थी। आजकल पंजाब राज्य में प्रशासन ने ऐसे डॉक्टरों की दुकानें बंद करवा रखी हैं तो वे विधानसभा के बाहर धरने पर बैंठे है। इनका तर्क है कि जब तक सरकार कोई उचित व्यवस्था नहीं करती तब तक हम जनता की सेवा करके उनकी मदद ही कर रहे हैं। यह इजाजत मांगना कुछ ऐस ही कि किसी गांव में अगर थाना नहीं है तो वहां कोई भी आदमी खाकी वर्दी पहन कर खुद को न सिर्फ हवलदार, थानेदार या एसपी कहने लगे, बल्कि किसी भी गांव वाले को उठाकर कमरे बंद करदे या मारपीट करे। कुछ वर्ष पहले तक अनुभवी कम्पाउंडरों का पंजीकरण करके रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर यानी आरएमपी बना दिया जाता था, लेकिन अब यह प्रणाली समाप्त कर दी गई है। भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद अधिनियम 1970 में अनुभव के आधार पर पंजीयन का अब कोई प्रावधान नहीं है। यदि कोई संस्था अनुभव के आधार पर पंजीयन करने का दावा करती है, तो वह सौ प्रतिशत अवैध है। सन 1998 में दिल्ली उच्च न्यायालय में कई प्रचलित वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता प्रदान करने के लिए एक याचिका दायर की गई थी। जिसके जवाब में न्यायालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह इन चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता प्रदान करने की संभावनाएं तलाशें। इसके लिए चिकित्सा अनुसंधान परिषद निर्देशक की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। हाल ही में प्रस्तुत इस समिति की रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जिन 10 वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता देने से मना किया उनमें जल चिकित्सा, मूत्र चिकित्सा, रत्प चिकित्सा (RAPT), प्राणिक हिलिंग, मैगेटोथैरेपी, रैकी, इलेक्ट्रोथिरैपी, अरोमाथिरेपी, कलर थिरेपी और रिफलेक्सोलॉ शामिल है। इनके द्वारा इलाज करने वाले चिकित्सकों को अपने नाम के साथ डॉक्टर लगाने का भी अधिकार नहीं है। इस संबंध में मंत्रालय के निर्देशों में कहा गया है कि कोई भी संस्थान गैर मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति में स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित नही करेगा। समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार कई वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का कोई प्रामाणिक साहित्य उपलब्ध नहीं है और न ही चिकित्सा की यह कोई प्रमाणिक विधि है। यहां तक कि इन चिकित्सा पद्धतियों में प्रयुक्त दवाओं के निर्माण में भी कोई प्रामाणिक विधि नहीं है और न ही इनकी गुणवत्ता के स्पष्ट मापदंड हैं।

Wednesday, September 12, 2012

जेनरिक दवाइयाँ क्या और कितनी सस्ती

हाल में आमिर खान के टीवी शो सत्यमेव जयते के एक कथांश से महंगी दवाइयों के विकल्प के रूप में उभरी जेनरिक दवाएं एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। इस विषय पर बात करें उससे पहले जानते हैं कि जेनरिक दवाएं क्या हैं, और इनकी कीमत कम क्यों होती है।
क्या होती है जेनरिक दवाइयां?
जेनरिक दवाइयों के सन्दर्भ में जिनरिक (फार्माकोपियल) शब्द का अर्थ दवा के मूल घटक से है। उस मूल घटक से ही प्रजाति विशेष जो दवाएं तैयार होती हैं उन्हें जेनरिक या प्रजातिगत दवा कहते हैं। उदाहरण के तौर पर बाजार में गेहूँ का जो आटा 15 रुपए किलो बिकता है, उसे हम जेनरिक दवा मान लेते हैं। अब अगर यही आटा कोई आदमी या कम्पनी अपने मार्के के साथ 40 रुपए किलो के हिसाब से बेचे तो उसे कहेंगे एथिकल दवा। कोई भी निर्माता एक उत्पाद को जेनरिक या ब्रान्ड नाम से बेच सकता है। चूकिं ब्रान्ड पर निर्माता का एकाधिकार होता है तथा वह अपने ब्राण्ड को प्रसिद्ध और प्रचार-प्रसार करने के लिए खूब सारा खर्चा करता है। वह बिचौलियों यानी दवा विक्रेताओं, अपने विक्रय प्रतिनिधियों और डॉक्टरों को कमिशन देता है। इस वजह से ब्रान्डिड दवाएं जेनरिक से बहुत मंहगी हो जाती है, हालांकि दोनों की गुणवत्ता समान ही होती है।
सरकार का आग्रह जेनरिक पर क्यों?
अधिकांश दवाइयों की निर्माण लागत बहुत कम होती है, लेकिन वे विभिन्न कारणों से रोगियों को कम दामों पर नहीं मिल पाती हैं, जैसे- चिकित्सक किसी दवा कम्पनी के ब्रान्ड नाम की दवा लिखते हैं, इससे प्रतिस्पर्धा हतोत्साहित होती है और बाजार में कृत्रिम एकाधिकार की स्थिति बनती है, जिसमें दवा कम्पनी द्वारा अधिकतम खुदरा मूल्य काफी ज्यादा रखा जाता है। एक बार फिर वही उदाहरण कि डॉक्टर आपसे कहे कि गेहूँ का आटा खाओ, तो आप कहीं से भी खरीदकर खा लेंगे, अब अगर वही डॉक्टर आपसे कहे कि नत्थू की चक्की से लेकर गेहूँ का आटा खाओ, तो आपकी मजबूरी है कि जिस भाव नत्थू आटा बेचे उसी भाव खरीदना पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार का आग्रह है कि डॉक्टर दवा का जेनरिक नाम लिखें। यानी  डॉक्टर गेहूँ का आटा ही लिखें, किसी विशेष चक्की का आटा न लिखें।
क्यों मंहगी हैं एथिकल दवा?
भारत में अधिकतर दवाइयां 'औषधि मूल्य नियंत्रण' से मुक्त होने के कारण निर्माता अपनी ब्रान्डिड दवाइयों पर अधिकतम खुदरा मूल्य बहुत ज्यादा  लिखते हैं। औषधि विक्रेता वही कीमत  मरीज से वसूल करता है। उपभोक्ताओं को यह बात मालूम ही नहीं है कि अधिकांश दवाइयों की उत्पादन लागत बहुत कम होती है। इसके अलावा यदि चिकित्सक ने किसी ब्रांड विशेष की दवा लिख दी तो फिर मरीज के पास उसे खरीदने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता, भले ही बाजार में वही घटक दवा कम कीमत पर उपलब्ध हो। दूसरी वजह हमारी मानसिकता है। हम यह मान कर चलते हैं कि अगर दोनों प्रकार की दवाओं के मूल्य में इतना अंतर है तो मंहगी दवा में जरूर कोई न कोई विशेषता होगी। दवा निर्माता कम्पनियां इसी भ्रम का फायदा उठाती हैं। उदाहरण के लिए एलर्जी या जुकाम के लिए एक दवा है सिट्रिजिन। कुछ कम्पनियां एलडे या सिटेन के नाम उसकी एक गोली को 5 से 6 रुपए में बेचती हैं, जबकि यही गोली अपने मूल नाम से मात्र 18 से 20 पैसे में उपलब्ध है।
क्यों होती है ये दवाइयां सस्ती?
किसी भी ब्रान्डिड या मौलिक दवा को बनाने में होने वाले शोध पर विशेष ज्ञान, समय तथा पूंजी लगती है, तब जाकर किसी कंपनी को एक दवा का एकाधिकार (पेटेंट)मिलता है। इन सब खर्चों के बाद कंपनी का मुनाफा और उस दवा को बेचने के लिए डॉक्टरों पर होने वाला खर्च भी कीमतों को बढ़ाता है। दूसरी और जेनरिक दवाइयों पर केवल इनके निर्माण का ही खर्च होता है, इसलिए इनकी कीमत अपेक्षाकृत बहुत ही कम होती है।
कुछ अड़चनें भी आईं
सन 1990 में जब जेनरिक दवाओं को खुला बाजार मिला तो कई बड़ी ब्रान्डिड कंपनियों ने पेटेंट और कॉपीराइट जैसे मुद्दों को उठाया और इन दवाओं को रोकने के कई प्रयास किए। दूसरे, ब्रान्डिड दवाओं से कुछ डॉक्टरों के कमीशन और कंपनियों के हित सीधे जुड़े होते हैं इसलिए खुदरा विक्रेता के पास मौजूद होने के बावजूद भी डॉक्टर दवा का जेनरिक नाम नहीं लिखते, इसलिए दवा विक्रेताओं ने इन्हें रखना कम कर दिया।
कितनी सस्ती कितनी मंहगी?

अब जेनरिक दवाइयों की कीमतों में हो रहे बड़े घालमेल पर भी एक नजर डाल लेते हैं। हालांकि मौलिक और जेनरिक दवा की कीमतों में बहुत बड़ा अंतर होता है, पर जेनरिक दवा के थोक और खुदरा मूल्य के बीच का अंतर भी अविश्वनीय है। जेनरिक दवाइयां गुणवत्ता के सभी मापदण्डों में ब्रान्डिड दवाइयों के समान तथा उतनी ही असरकारक होती है। जेनरिक दवाइयों को बाजार में उतारने का लाइसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। दवा खरीदते समय यह ध्यान आपको रखना है कि जेनरिक दवा भी किसी नामी और अच्छी कम्पनी की हो, वरना बाजार नकली और घटिया दवाइयों से भरा पड़ा है। सलाह यह दी जाती है कि जेनरिक दवा हमेशा सरकारी दुकानों से ही खरीदें, बाजार में यह दवा आपको सस्ती नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए जेनरिक दवा सिट्रिजिन की 10 गोली का एक पत्ता सरकारी दुकान पर 2 से ढाई रुपए का मिलता है जबकि बाजार में यह 24 से 26 रुपए का मिलेगा।

Thursday, September 6, 2012

स्वास्थ्य-दशा सुधार अपेक्षित

हालांकि विगत कुछ वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य की दशा में कुछ सुधार हुआ है। शिशु व मातृत्व मृत्यु दर में कमी आई है। कई गंभीर बीमारियों पर काबू पा लिया गया है और जीवन प्रत्याशा में भी वृद्धि हुई है। मगर इन उपलब्धियों के बाद भी देश का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर ग्रामीण भारत आज भी उचित स्वास्थ्य देखरेख से वंचित है। भौतिकवादी सुख सुविधाओं के प्रसार तथा आरामपरस्त जीवन शैली के कारण किसी जमाने की खालिस शहरी बीमारियां कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह अब ग्रामीणों को अपने जाल में ले चुकी हैं।
गत वर्षों के दौरान भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन बढ़ती जनसंख्या पर काबू न रहने के कारण हम इस क्षेत्र में लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। पिछले एक दशक में जनसंख्या में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि प्रति हजार जनसंख्या में बीमार व्यक्तियों की संख्या में 66 प्रतिशत की। इस दौरान अस्पताल में बिस्तरों की संख्या एक हजार की जनसंख्या के पीछे मात्र 5.1 प्रतिशत ही बढ़ी है। देश के अस्पतालों में औसत  प्रति हजार जनसंख्या पर बिस्तर की उपलब्धता 0.86 है जो कि विश्व औसत का मात्र एक तिहाई ही है। चिकित्साकर्मियों की कमी और अस्पतालों में व्याप्त कुप्रबंधन के कारण कितने ही रोगी-बिस्तर वर्ष भर खाली पड़े रह जाते हैं जिनकी वजह से वास्तविक बेड घनत्व और भी कम हो जाता है।
यह आंकड़े भी हमारी राष्ट्रीय औसत के हैं ग्रामीण क्षेत्रों में जहां देश की 72 प्रतिशत आबादी है, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वहां बिस्तरों की संख्या देश के अस्पतालों में उपलब्ध बिस्तरों का मात्र 19 प्रतिशत तथा चिकित्साकर्मियों का 14 प्रतिशत ही है। ग्रामीण स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्साकर्मियों की भारी कमी है। इन केन्द्रों में 62 प्रतिशत विशेषज्ञ चिकित्सकों, 49 प्रतिशत प्रयोगशाला सहायकों और 20 प्रतिशत फार्मासिस्टों की कमी है। इस भारी कमी के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला जरूरत की तुलना में स्वीकृत पद कम हैं और दूसरा, सीमित अवसरों और सुविधाओं के आभाव के कारण चिकित्साकर्मी ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से कतराते हैं। इससे ग्रामीणों को गुणवक्तायुक्त चिकित्सा सेवा नहीं मिलती और उन्हें नीम-हकीमों या निजी क्षेत्र की शरण में जाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इसके विपरीत राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2004 के अनुसार देश के 68 प्रतिशत लोग सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की तुलना में अत्यधिक महंगी निजी चिकित्सालयों की सेवा लेते हैं। वहीं दूसरी तरफ महंगी निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण ग्रामीण वर्ग चिकित्सा खर्च के लिए बड़े पैमाने पर क़र्ज़ लेता है। ग्रामीण क्षेत्रों के औसतन 41 प्रतिशत भर्ती होने वाले और 17 प्रतिशत वाह्य रोगी क़र्ज़ लेकर इलाज करवाते हैं।
ग्रामीणों को सस्ता और जवाबदेह इलाज उपलब्ध करवाने के लिए 12 अप्रैल 2005 से 18 राज्यों के लिए 2012 तक के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन शुरूआत की गई। मिशन से ऐसी स्वास्थ्य सुविधाओं की उम्मीद थी, जो सस्ती, पहुंच के भीतर और उत्तरदायी हो। एनआरएचएम का मकसद खराब स्वास्थ्य सुविधाओं वाले राज्यों में स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे की कमियों को दूर करने का था। डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी को पूरा किया जाना था। स्वास्थ्य केंद्र खोलने के साथ-साथ दवाइयों और उपकरणों की बेहतर आपूर्ति पर भी काफी जोर था, लेकिन यह मिशन इन कसौटियों पर खरा नहीं उतर सका और बाकी सरकारी योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।

अगर आ जाए जमीन कुर्की का नोटिस

ज्यादातर भारतीय किसान उस कबूतर जैसी समझ रखते हैं जो बिल्ली को देखकर आखें बंद कर लेता है और सोचता है कि वह अब बिल्ली को मैं नज़र नहीं आ रहा। बैंक का क़र्ज़ नहीं चुका पाने की सूरत में वह बैंक के आगे से निकलना बंद कर देता है। घर आए बैंक के कर्मचारियों से मिलता नहीं है, उनके किसी पत्र का जवाब नहीं देता और अंतिम नोटिस तक छुपाकर बैठा रहता है। आखिरकार वह दिन भी आ जाता है जब सरकारी अधिकारी खड़ी फसल को जब्त कर लेते हैं और जमीन की कुर्की करने खेत पर आ खड़े होते हैं। जब कुर्की का नोटिस आ जाए तो क्या करना चाहिए, जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि लगभग हर राज्य में कृषि ऋण वसूलने के लिए कानून बने हुए हैं, जिनके तहत बैंक राज्य सरकार को ऋण वसूली का कार्य सौंप देते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान में 1956 का कृषि ऋण अधिनियम जब कमजोर होता दिखा तो 21 सितंबर 1974 को राजस्थान कृषि ऋण संक्रिया (कठिनाइयाँ एवं निवारण) अधिनियम-1974 लागू किया गया और उसे भी 10 मार्च 1976 को सुधार करके और प्रभावी बनाया गया। इस कानून को हम अंग्रेजी के संक्षिप्त नाम राको-रोडा या रोडा एक्ट के नाम से ज्यादा जानते हैं।
क्या है वसूली कानून?
इस कानून के अंतर्गत बैंक ग्राहकों दो साधारण डाक और एक रजिस्टर्ड डाक द्वारा मांग-पत्र भेजता है। इस अंतिम नोटिस के एक माह बाद बैंक उस क्षेत्र के कलक्टर/ अतिरिक्त कलक्टर/उपखण्ड अधिकारी या तहसीलदार को ऋण करार की प्रमाणित प्रतिलिपि, खाते का प्रमाणित विवरण, मूल और ब्याज मिलाकर कुल रकम का विवरण, सम्बन्धित साक्ष्य के साथ बन्धक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि, बैंक में रहन रखी सम्पति के मूल्यांकन का ब्यौरा और वसूली हेतु बैंक द्वारा किए गए प्रयासों का विवरण प्रस्तुत कर निवेदन करता है कि चूककर्ता से राशि दिलवाई जाए। इसके बाद यह सक्षम अधिकारी चूककर्ता को किसी कर्मचारी के हाथ नोटिस भिजवा कर पैसे जमा करवाने या अपना पक्ष रखने के लिए कहता है। इसके बाद किसान थोड़ा सा हरकत में आता है और अब भी पैसे जमा करवाने की बजाए किसी वकील को ढूंढता है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि अगर आपके खाते में जोड़-बाकी का कोई अंतर है और उसे बैंक अधिकारी मान नहीं रहा हो तो यह सरकारी अधिकारी आपका पक्ष जरूर सुनेगा और बैंक को इस गलती को सुधारने के लिए बाध्य भी करेगा। ज्ञात रहे इसके लिए आपको किसी वकील की जरूरत नहीं है, खातेदार स्वयं अपना पक्ष अधिकारी के सामने रख सकता है।
क्या करना चाहिए?
किसान को बैंक से दो तरह का क़र्ज़ मिलता है। पहला किसान क्रेडिट कार्ड पर अधिकतम 3 लाख तक। इस ऋण का ब्याज फसल आने पर और मूल साल में एक बार एक या दो दिन के लिए जमा करवाना होता है। आजकल सरकार ने इस पर ब्याज दर मात्र 4 प्रतिशत ही लगाने के आदेश दे रखे हैं। चूक होने पर यह ब्याज दर 14 से 16 प्रतिशत हो जाती है। इस ऋण के बारे में सलाह यह दी जाती है कि बैंक का पैसा समय पर लौटाया जाए और अगर किसी वजह से पैसा नहीं है तो कहीं से भी दो-चार दिन के लिए ब्याज पर पकड़कर भी खाता खराब होने से बचा लें।
दूसरी तरह का ऋण किसी वस्तु विशेष के लिए तय किस्तों के साथ दिया जाता है। इस ऋण में सभी किस्तें समय पर भरवानी चाहिएं और अगर किसी वजह से किस्त की राशि पूरी नहीं बन रही है तो जितनी भी रकम हाथ में हो उतनी ही जमा करवा दें और जब स्थितियां अनुकूल हों तो बाकी रकम भी जमा करवा दें। अपने खाते की नकल समय-समय पर ले कर जांचते रहें कि कोई अंतर तो नहीं है।
खाता बिगडऩे पर
बैंक का पहला संदेश या नोटिस आते ही बैंक जाकर अधिकारी या प्रबंधक से मिलकर अपनी समस्या हो सके तो लिखित में बताएं। साथ ही उन्हें आश्वत करें कि बकाया राशि (ओवरड्यू) कब तक भरवा देंगे। इसके लिए कुछ राशि नकद या चेक देकर भी कानूनी कार्रवाही को टाला जा सकता है।
मंहगा है यह तरीका
अगर आपने सरकारी नोटिस के बाद पैसे जमा करवाए तो कुल राशि पर 2 प्रतिशत वसूली प्रभार और देना पड़ेगा तथा सरकार ने आपकी बैंक के पास रहन रखी भूमि कुर्क करके वसूली है तो 5 प्रतिशत वसूली के प्रभार देना होगा। मतलब यह कि अगर बैंक 5 लाख मांगता है तो इस नोटिस के बाद यह राशि 5 लाख 10 हजार और नीलामी के बाद 5 लाख 25 हजार हो जाती है। सार यह कि जब तक मामला बैंक के हाथ में है, तब तक ब्याज व जुर्माने आदि में छूट की गुंजाइश है, अगर सरकार द्वारा कुर्की नोटिस जारी हो गया तो 2 से 5 प्रतिशत का खर्चा पक्का है। इस बात को हमेशा याद रखें कि आपकी जमीन की कीमत आपके क़र्ज़ की राशि से कई गुणा ज्यादा होती है। अकसर यही होता है कि जमीन बेचकर बैंक की राशि बैंक को तथा अपना प्रभार काटकर शेष राशि खातेदार को दे दी जाती है। इस विषय में सर्वोच्च न्यायालय भी आदेश दे चुका है कि सार्वजनिक वसूली के लिए किसी संपत्ति की नीलामी से बकाया रकम से ज्यादा पैसा मिलता है तो शेष धनराशि संपत्ति के मालिक को लौटा दी जानी चाहिए।