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Monday, January 23, 2012

मनरेगा: क्या अभिशाप है?

नरमे कपास की चुगाई के ठण्डे मौसम में मजदूरों की किल्लत और बढ़ती चुगाई लागत के बारे में सोचकर ही किसान को पसीना आने लगता है। इसका एक मुख्य कारण माना गया है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को। ऐसा नहीं है कि यह अकेले किसानों की ही शिकायत है, उद्योग जगत भी उतना ही हलकान है। इन दोनों का ही मानना है कि यह खतरे की घंटी है जो मुनाफे को लगातार घटा रही है। कल तक गांव में मजदूर 80 से 100 रूपए में आसानी से मिल जाते थे वो अब 200 से 250 रूपए में भी नहीं मिलते। ग्रामीण क्षेत्र में ऊंची मजदूरी दरों का मतलब है निर्माण कार्यों, कारखानों और अन्य कामों के लिए सस्ती श्रम शक्ति का अभाव।
यह है मनरेगा का एक पहलू, इस सिक्के का दूसरा पहलू देखने से पहले एक नजर मनरेगा के मुख्य मकसद की ओर। सूखा प्रभावित और वर्षा आधारित खेती क्षेत्रों में आमतौर पर 4 से 6 महीनों तक कोई काम नहीं होता है। खेती में खाली समय के दौरान ग्रामीण मजूदरों के पास कोई रोजगार नहीं होता या फिर जो काम मिलता उसमें पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलती। इसलिए ये लोग वैकल्पिक रोजगार की तलाश में नजदीक के शहरों का रुख करते हैं। रोजगार गारंटी योजना से इन मजदूरों को खेती में खाली समय के दौरान गांव में ही रोजगार उपलब्ध होने लगा और उन्हें काम की तलाश में अस्थायी रूप से शहरों में डेरा भी नहीं डालना पड़ाता। जबसे मनरेगा ने न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की है तब से मजदूर कम मजदूरी पर काम करने की बजाय मनरेगा से जुडऩा ज्यादा पसंद करने लगे हैं। हालांकि रोजगार गारंटी योजना न्यूनतम मजदूरी से ज्यादा कुछ और नहीं देती, और रोजगार केवल 100 दिनों के लिए मिलता है न कि साल के 365 दिनों के लिए। देश में साल भर खेती केवल उन्हीं इलाकों में होती है जो सिंचित है। इन क्षेत्रों में श्रम भी सस्ता उपलब्ध होता है क्योंकि वर्षा पर निर्भर इलाकों के मजूदर यहां काम के लिए आते हैं। मनरेगा ने यह तस्वीर भी बदल दी है, अब सूखे के दौरान यहां के मजदूर भी सिंचित क्षेत्रों की ओर रुख नहीं करते। इस वजह से सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में खेतीहर मजदूरी की दरें बढ़ी है। रोजगार गारंटी योजना मजदूरी की दरों को बहुत ऊपर ला दिया है, अब खेतीहर मजदूर भी काम निश्चित घंटों और दो समय की चाय व दोहपहर के खाने छूट्टी की बात करने लगा है। ये दबाव इसलिए बना है क्योंकि कानून ने एक आधार तैयार कर दिया है। मजदूरी दरें बढऩे से एक ओर खेती की लागत बढ़ गई और दूसरी ओर कल-कारखानों में बनने वाले सामान भी मंहगे हुए हैं।
अब बात करते हैं मनरेगा से लाभ क्या हुआ है और इसमें फैले भ्रष्टाचार का इतना हल्ला क्यों है? पहले उन लोगों की बात करें जो रोजगार गारंटी योजना का विरोध करते हैं तो यह तर्क देते हैं कि इसमें भ्रष्टाचार का बोलबाला है और गरीबों तक यह योजना नहीं पहुंच पा रही है, यदि पहुंच भी रही है तो उन्हें उनका पूरा हक नहीं मिल रहा है। इसके जवाब में एक ही बात कही जा सकती है कि हमें हर अच्छी योजना में भ्रष्टाचार का रास्ता निकाल लेने में महारथ हासिल है। कोई यह बात क्यों नहीं कह रहा कि पिछले कुछ अरसे में मजदूरी दर की तुलना में प्रबंधकों को मिलने वाली राशि कई गुना बढ़ी है? वास्तव में जो लोग भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं और बढ़ी हुई मजदूरी दरों के लिए मनरेगा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, क्या उनकी नजर में मंहगाई सिर्फ उच्च वर्ग के लिए ही बढ़ी है? क्यों हर बार मजदूरी बढ़ाने के लिए सरकार को आगे आना पड़ता है? क्यों हर बार हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है? अहम सवाल यह है कि क्या हम मनरेगा से पहले न्यूनतम मजदूरी दर की शर्तों को पूरा कर रहे थे? आखिर 100 दिन की न्यूनतम रोजगार गारंटी योजना कैसे शेष 265 दिनों की मजदूरी दरों को प्रभावित कर सकती है, यह तभी हो सकता है जब मजदूरों में काम करने की इच्छा ही न हो और वे उन्हीं 100 दिनों की कुल कमाई 11 हजार 900 रूपयों से ही खुश हों, जिसका कुछ हिस्सा तथाकथित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। या दूसरे शब्दों में कहें तो मजदूर अपनी मुफलिसी में ही खुश हैं इस बात की ताईद करते हैं जो हम सदियों से सुनते आए हैं कि गरीब इसलिए गरीब हैं क्योंकि वे काम नहीं करना चाहते। पिछले कुछ महीनों में मजदूरी की दरों में जबरदस्त उछाल आया है, यह उन लोगों की सोच पर सवाल है जो मनरेगा और बढ़ती मजूदरी दरों में प्रत्यक्ष संबंध देखते हैं। वास्तव में हमे प्रसन्न होना चाहिए कि हालिया महीनों में मजदूरी की दर खाद्य मुद्रास्फीति की तुलना में ज्यादा बढ़ी है। आखिरकार ऐसे बदलाओं से ही हम गरीबी से निजात पाने की उम्मीद कर सकते हैं।

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