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Thursday, December 22, 2011

फाइनैंशल लिटॅरॅसी एंड क्रेडिट काउंसॅलिंग

वर्तमान में देश के 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 640 जिले हैं। इन सभी जिलों में रिजर्व बैंक के एक आदेशानुसार वहां के लीड बैंकों द्वारा विदेशों की तर्ज पर फाइनैंशल लिटॅरॅसी एंड क्रेडिट काउन्सॅलिंग(एफएलसीसी) अथवा वित्तीय साक्षरता एवं साख परामर्श केन्द्र खोले जाने हैं। आइए बांचते हैं कि इन केंद्रों की जनम-पतरी और जानते हैं कि इनकी जरूरत क्यों पड़ी तथा इनके उद्देश्य एवं कार्य क्या हैं?
आरम्भ
रिजर्व बैंक द्वारा नियुक्त कृषि ऋणों की प्रक्रियाओं की जांच हेतु कार्यसमूह के अध्यक्ष सी. पी. स्वर्णकार ने अपनी अप्रैल 2007 की रिपोर्ट में यह अनुशंसा की थी कि ऋण एवं तकनीकी परामर्श हेतु एकल रूप से अथवा सामूहिक संसाधनों के साथ बैंकों को परामर्श केन्द्र खोलने हेतु सक्रियतापूर्वक विचार करना चाहिए। इससे किसानों में अपने अधिकार एवं दायित्व के प्रति बहुत हद तक जागरूकता आएगी। बैंक शाखाओं को जितनी अधिक हो सके उतनी जानकारियां किसानों के लिए उपलब्ध करानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, आपदाग्रस्त किसानों की सहायता हेतु सुझाव के लिए रिजर्व बैंक द्वारा गठित एक अन्य कार्य समूह के अध्यक्ष एस. एस. जोल ने भी सुझाव दिया था कि ऋण की व्यवहार्यता को बढ़ाने के लिए वित्तीय एवं जीविका संबंधी परामर्श महत्वपूर्ण हैं। इन कार्यसमूहों के सुझावों पर आधारित तथा वर्ष 2007-08 के लिए वार्षिक नीति विवरण की घोषणा के रूप में रिजर्व बैंक ने सभी राज्यों में स्थित राज्य स्तरीय बैंक  समिति को जारी किए गए एक सर्कुलर द्वारा यह सलाह दी कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले राज्य अथवा केन्द्रशासित प्रदेश के सभी जिलों में वित्तीय साक्षरता एवं साख परामर्श केन्द्र की स्थापना करें।
साख परामर्श- वैश्विक परिदृश्य
साख परामर्श जिसे युनाइटेड किंगडम में ऋण परामर्श अर्थात डेब्ट काउंसलिंग कहते हैं यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा ग्राहकों को ऐसे ऋणों से बचने के बारे में सलाह दी जाती है जिसे चुकाया नहीं जा सकता। साख परामर्श के अंतर्गत प्राय: ग्राहक के लिए ऋण प्रबन्धन योजना अर्थात डेट मैनेजमेंट प्लान बनाने हेतु ऋण लेने वाले व्यक्तियों के साथ वार्ता शामिल है। ऋणदाता के साथ ऋण चुकाने की योजना बनाकर ऋण लेने वाले व्यक्ति को ऋण चुकाने में मदद करता है। ऋण प्रबन्धन योजनाओं में ग्राहकों को भुगतानों अथवा ब्याज में दी जाने वाली छूट का निर्धारण करने हेतु साख परामर्शदाता ऋणदाताओं द्वारा दी गई शर्तों के हवाले से अपने ग्राहकों को उनकी समस्याओं का वास्तविक समाधान ढूंढने में मदद करता है और उन्हें ऋणों के संभव भुगतान के लिए राजी करता है। साख परामर्श को गोपनीय रखा जाता है।
पहली ज्ञात साख परामर्श एजेंसी की स्थापना वर्ष 1951 में, अमेरिका में की गई, जब साख देने वालों ने नैशनल फाउंडेशन फॉर क्रेडिट काउंसॅलिंग (एनएफसीसी) का गठन किया था। उनका उद्देश्य था वित्तीय शिक्षा को बढ़ावा देना तथा उपभोक्ताओं को दिवालिया होने से बचाना। वहीं वर्ष 1968 में हाउजिंग एंड अरबन डिवेलपमेंट अधिनियम के पास होने के बाद साख परामर्श को पहचान मिली। अमेरिका में ही वर्ष 1993 में असोसिएशन ऑफ इंडिपेंडेंट कंज्यूमर साख काउंसॅलिंग एजेंसीज की स्थापना तथा बैंकरप्सी एब्यूज प्रिवेंशन एंड कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2005 ने साख परामर्श को अमेरिका में दिवालियापन के लिए कंज्यूमर डेटर फाइलिंग के लिए जरूरी बना दिया। जल्द ही इस संकल्पना को अन्य देशों में भी चलाया जाने लगा, तथा पिछले कुछ वर्षों में बहुत सारे देशों ने साख परामर्श की दिशा में अहम कदम उठाए। वर्ष 1993 में ब्रिटेन में स्थापित कंज्यूमर साख काउंसलिंग सर्विस उपभोक्ताओं को बजट बनाने तथा धन के बेहतर प्रबंधन के लिए मदद करती है। साथ ही एक राष्ट्रीय ऋण रेखा भी है, जिसके जरिए बैंक का ग्राहक नि:शुल्क वित्तीय परामर्श प्राप्त कर सकता है। वर्ष 2000 में कनाडा में एक गैर-लाभ वाले परामर्श संगठन की स्थापना की गई। टम्र्ड क्रेडिट काउंसलिंग कनाडा का उद्देश्य अपने सभी नागरिकों के लिए गैर-लाभ वाले साख परामर्श की गुणवत्ता तथा उपलब्धता को बढ़ावा देना है। द बैंक नेगारा, मलेशिया ने क्रेडिट काउंसॅलिंग एंड डेट प्रबंधन एजेंसी की स्थापना की है, तथा वर्ष 2003 में सिंगापुर क्रेडिट काउंसॅलिंग की स्थापना हुई, जिसका लक्ष्य है वित्तीय रूप से मुसीबत में पड़े उपभोक्ताओं का मदद करना।
साख परामर्श की आवश्यकता
हाल के वर्षों में व्यावसायिक बैंकिंग क्षेत्र में खुदरा ऋणों का चलन काफी बढ़ गया है तथा खुदरा ऋण बैंकों का मुख्य व्यवसाय बन गया है। उपभोक्ता ऋणों, गृह ऋणों, क्रेडिट कार्ड तथा व्यक्तिगत ऋणों में तेजी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2001 में शहरी एवं महानगरीय क्षेत्रों के अंतर्गत हाउजिंग, कंज्यूमर ड्यूरेबल्ज तथा व्यक्तिगत ऋणों (क्रेडिट कार्ड सहित) के अंतर्गत 87.1 लाख खाते थे जिनके तहत ऋण 42 हजार 700 करोड रूपए था, वर्ष 2006 में यह बढ़कर 255 लाख खाते तथा ऋण राशि कुल 2 लाख 58 हजार करोड़ रूपए हो गयी। यह वृद्धि अन्य क्षेत्रों की 23.4 प्रतिशत की तुलना में 43.3 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर रही।
शहरी क्षेत्रों में बढ़ते हुए मध्यवर्ग और लोगों की बदलती जीवनशैली के कारण अधिक से अधिक लोग संपत्ति निर्माण के अतिरिक्त अपनी उपभोक्ता आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऋण लेने लगे हैं। बिना सही योजना के लिया गया ऋण और अचानक आई बीमारी, नौकरी छूट जाने जैसे कुछ आपात स्थितियों में उपलब्ध आय सीमा के अंतर्गत ऋण चुका पाना मुश्किल हो जाता है। व्यक्तिगत ऋणों के जबरदस्त विपणन एवं ऋण लेने वाले कमजोर वर्ग के हाथ में क्रेडिट कार्ड आने से ऋण ग्रस्तता एवं एनपीए (नॉन पर्फोमिंग असेट) में अच्छी-खासी वृद्धि हुई है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में, खासकर वर्षा आधारित कृषि वाले क्षेत्रों में मानसून की अनियमितता और जोखिम कम करने की उचित नीतियों के अभाव में वर्षा आधारित कृषक वर्ग को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बिना सोचे-समझे ऋण लेने के मामले में ग्रामीण क्षेत्र, शहरी क्षेत्र से एक कदम आगे ही है उसका मुख्य कारण शहरी एवं ग्रामीण जनसंख्या में साक्षरता स्तर में भारी अंतर होना भी है। वर्ष 2001 में देश भर की औसत साक्षरता दर केवल 65.4 प्रतिशत थी। किसानों पर किए गए परिस्थिति मूल्यांकन सर्वेक्षण (सिचुएशन असेसमेंट सर्वे) के अनुसार वर्ष 2003 में 893.3 लाख किसान परिवारों में से 434.2 लाख (48.6 प्रतिशत) किसान परिवार ऋण के बोझ तले दबे थे। औसत बकाया ऋण प्रति किसान परिवार 12,585 रु. था। राज्यवार विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि वर्ष 2003 में ऋणग्रस्तता की घटना ऐसे राज्यों में अधिक हुई जहां अधिक लागत वाली खेती की जाती थी अथवा जहां की कृषि विविधतापूर्ण थी। 2003 में किसान परिवारों के कुल ऋण की राशि 1.12 लाख करोड़ रु. थी; जिसमें से 65,000 करोड़ रु. संस्थागत स्रोतों से एवं 48,000 करोड़ रु. गैर-संस्थागत एजेंसियों से दिए गए थे। व्यक्तिगत महाजनों और सूद व्ययापारियों द्वारा 29,000 करोड़ रु. तथा मंडी में कारोबार करने वाले व्यापारियों द्वारा 6,000 करोड़ रु, दिए गए। गैर-संस्थागत स्रोतों से प्राप्त लगभग 18,000 करोड़ रु. के ऋण का एक बड़ा भाग ऐसे महाजनों द्वारा दिया गया था जिन्होंने 30 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर रखी थी। जून 2004 के बाद से, यद्यपि कृषि क्षेत्र को बैंकिंग व्यवस्था से मिलने वाले ऋणों में अच्छी खासी वृद्धि हुई है, अनौपचारिक वित्त पौषण आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आर. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित कृषि ऋणग्रस्तता पर विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के अनुसार किसानों की ऋणग्रस्तता की स्थिति को आपदाकारी घटना के रूप में देखा गया है। अकसर ऐसा तब होता है जब लिए गए ऋण को उत्पादक कार्यों में इस्तेमाल न किया जाए। ऋण लेना उस स्थिति में भी आपदाकारी घटना बन जाती है जब ऋण लेने वाले किसान की फसल प्राकृतिक आपदाओं, कीटों, नकली बीजों, गैर-बुद्धिमत्तापूर्ण निवेशों अथवा अन्य अप्रत्याशित कारणों से बरबाद हो जाए या उच्च उत्पादन लागत, पिछड़ी हुई तकनीक के कारण उपज अलाभकारी हो जाए तथा बाजार में मिलने वाला मूल्य इतना अपर्याप्त हो कि किसान के लिए ऋण की मूल राशि और उसका ब्याज चुका पाना असंभव हो जाए।
इस संदर्भ में वित्तीय साक्षरता एवं साख परामर्श अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आपदाग्रस्त कर्जदारों को ऋण-बकाया की स्थिति से उबरने में सक्षम बनाने के लिए फॉलोअप सेवाओं को विकसित किए जाने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। ऐसे में साख परामर्शदाता कर्जदार एवं संबंधित बैंक के बीच अस्थाई मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। अनेक स्थितियों में, खासकर अधिक कमजोर वर्गों के लोग बैंकों को अपनी वित्तीय स्थिति के बारे में साफ-साफ बताकर कोई समझौता कर पाने में सक्षम नहीं होते। इसलिए, यह खुद बैंकों के हित में होगा कि वे उचित वित्तीय शिक्षा एवं वित्तीय परामर्श के द्वारा अपने कर्जदारों की मदद करें। ज्ञात रहे ऋण परामर्श व्यक्तिगत कर्जदारों के लिए है, संस्थागत कर्जदारों के लिए नहीं।
भारतीय रिजर्व बैंक उठाए गए कदम
रिजर्व बैंक ने एक परियोजना अपने हाथ में ली है जिसका नाम 'परियोजना वित्तीय साक्षरताÓ है। इस परियोजना का उद्देश्य है केन्द्रीय बैंक तथा सामान्य बैंकिंग अवधारणाओं से संबंधित जानकारियों को विभिन्न लक्षित समूहों, जैसे स्कूल एवं कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राओं, महिलाओं, ग्रामीण एवं शहरी गरीबों, रक्षाकर्मियों तथा वरिष्ठ नागरिकों में प्रसारित करना। लक्षित समूहों तक जानकारियों का प्रसार अन्य माध्यमों के साथ-साथ बैंकों, स्थानीय सरकारी तंत्र, एनजीओ, स्कूलों तथा कॉलेजों द्वारा प्रस्तुतिकरणों, पर्चों, पुस्तिकाओं, फिल्मों तथा रिजर्व बैंक के वेबसाइट के जरिए किया गया है। रिजर्व बैंक ने इसके लिए अपनी वेबसाइट में एक लिंक आम लोगों के लिए बना रखा है जिसके माध्यम से उन्हें अंग्रेजी, हिन्दी तथा भारत की 12 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में वित्तीय जानकारी प्राप्त हो सकती है। अभी हाल में रिजर्व बैंक ने अंतर-स्नातक छात्रों में बैंकिंग क्षेत्र तथा रिजर्व बैंक के बारे में जागरूकता एवं दिलचस्पी पैदा करने के लिए 'आरबीआई युवा विद्वत् पुरस्कार योजना आरंभ की है जिसके अंतर्गत 150 युवा विद्वानों का देशव्यापी प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए चयन किया जाएगा और रिजर्व बैंक पर छोटी अवधि की परियोजनाओं पर कार्य करने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान की जाएगी
बैंकों द्वारा उठाए गए कदम
हाल ही में साख परामर्श पहल के अध्ययन हेतु रिजर्व बैंक द्वारा एक आंतरिक समूह के गठन के बाद कुछ राज्यों में कुछ परामर्श केन्द्रों स्थापित किए गए हैं जैसे- बैंक ऑफ इंडिया द्वारा 'अभय; इसीआइसीआइ का 'दिशा ट्रस्ट तथा बैंक ऑफ बड़ौदा की पहल ग्रामीण परामर्श केन्द्र 'सारथी के अतिरिक्त सभी लीड बैंकों द्वारा अपने-अपने जिलों में ऐसे केंद्र आरम्भ किए हैं। इन केन्द्रों पर परामर्शदाता लोगों को आमने-सामने की प्रत्यक्ष सलाह देकर तो मदद करते ही हैं, इसके अतिरिक्त लोगों की सहायता उनके द्वारा टेलीफोन, ई-मेल अथवा पत्राचार के जरिए भी की जाती है।
कार्य क्षेत्र
यद्यपि साख परामर्श सेवाएं बैंकों द्वारा ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रदान की जा सकती हैं, इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारतीय जनसंख्या का विशाल भाग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है जिनकी साक्षरता का स्तर शहरी जनसंख्या की साक्षरता स्तर से निम्न है। ग्रामीण जनसंख्या अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए अनौपचारिक क्षेत्रों पर अधिक निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित केन्द्र कृषक समुदायों तथा कृषि से संबंधित व्यवसायों से जुड़े लोगों की वित्तीय साक्षरता एवं परामर्श पर केन्द्रित हो सकते हैं। महानगरों व शहरी क्षेत्रों में स्थापित केन्द्र ऐसे लोगों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं जिनपर क्रेडिट कार्ड, व्यक्तिगत ऋण, गृह ऋण इत्यादि बकाया हों। अपने नेटवर्क और पहुंच के अनुसार राजकीय क्षेत्र के बैंक ग्रामीण क्षेत्रों पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे जबकि निजी एवं विदेशी बैंक अपने परामर्श केन्द्र शहरी क्षेत्रों में स्थापित करेंगे।
केंद्रों का संचालन
एफएलसीसी के संचालन के लिए, बैंकों द्वारा एकल रूप से अथवा अन्य बैंकों के साथ संयुक्त रूप से ट्रस्टों अथवा सोसाइटियों की स्थापना की गई है। बैंक ऐसे ट्रस्ट अथवा सोसाइटी के बोर्ड में स्थानीय सम्मानित नागरिकों को शामिल कर सकता है तथापि, कार्यरत बैंककर्मी बोर्ड में शामिल नहीं किए जा सकते। आरंभ में लीड बैंकों द्वारा जिला मुख्यालयों में एफएलसीसी की स्थापना के लिए कदम उठाए गए हैं अधिकाधिक विस्तार हेतु एफएलसीसीज की स्थापना सभी स्तरों अर्थात प्रखंड, जिला, शहर तथा महानगर स्तरों पर की जा सकती है। परामर्श केन्द्रों को बैंक के साथ नजदीकी संबंध बनाए रखना चाहिए और यथासंभव इन्हें बैंक परिसरों में स्थित नहीं होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में यदि लागत कम करने की दृष्टि से बैंक शाखा के परिसर का उपयोग किया जाता है तो इसे पूरी तरह अलग होना चाहिए। इसके पीछे यह धारणा है कि इन केन्द्रों को संबद्ध बैंकों के वसूली अथवा विपणन एजेंटों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए और बैंक के ग्राहक वर्ग, यहां तक कि दूसरे बैंकों के ग्राहक वर्ग भी स्वयं अपनी इच्छा से इन केन्द्रों से संपर्क करने में सुविधा अनुभव कर सके। परामर्श एवं ऋण प्रबन्धन सेवाएं ग्राहकों को नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगी ताकि उन पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े।
साख परामर्श तथा ऋण निपटारे की प्रणाली
बैंकों को मुसीबत में पड़े अपने ग्राहकों को या किसी भी बैंक के ग्राहकों को एफएलसीसी में संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। एफएलसीसी समूह परामर्श के लिए खुले सेमिनार का आयोजन कर सकता है, जिन्हें या तो केंद्र पर या जिले के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया जा सकता है। सिंगल क्रेडिटर-डेट के लिए एफएलसीसी उधारकर्ता को संबंधित बैंक से साथ मोल-भाव करने में मदद कर सकता है। व्यक्तियों द्वारा उपलब्ध बहु-प्रायोजन ऋण की स्थिति में खुद भी  बैंक/बैंकों के साथ मोल-भाव कर सकता है, जो उधार राशि को पुनर्गठित करने के लिए व्यापक फैलाव वाले हों, तथा पुन: वसूली को यथा अनुपात (प्रो-रेटा) आधार पर साझा किया जाए। हालांकि एफएलसीसी स्वयं को धन की वसूली तथा वितरण में शामिल नहीं करेगा। यह कार्य संबंधित बैंक का होगा या उस व्यक्ति या संस्था का जिसे बैंकों की तरफ से नियुक्त किया गया हो।
शिक्षा तथा प्रशिक्षण- परामर्शदाता
चूंकि परामर्श केंद्र परेशान उधारकर्ता को मदद करने तथा मार्गदर्शन देने में अहम और जिम्मेदार भूमिका निभाता है, अत: यह आवश्यक है कि केवल सुशिक्षित/सुप्रशिक्षित परामर्शदाताओं का ही चयन इन केंद्रों पर फुल टाइम कर्मचारी के रूप में किया जाए। वर्ष 2008-09 के अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने यह संकेत दिया कि ऐसे व्यक्ति जो सेवा-निवृत बैंक अधिकारी, या पूर्व सेवाकर्मी इत्यादि हैं, भी प्रमाणित परामर्शदाता के रूप में नियुक्त किए जाएंगे। साख परामर्शदाता को बैंकिंग, कानून, वित्त के अनुभव होने चाहिए तथा वे बातचीत के बेहतरीन हुनर तथा टीम बनाने की क्षमता वाले होने चाहिए। वर्तमान में व्यक्तिगत परामर्शदाता के लिए क्षमता तथा ज्ञान को अद्यतन करना काफी अहम हो गया है। इस कार्य के लिए बैंकों द्वारा कुछ प्रशिक्षण भी दिया जाता है, पर यह वित्तीय प्रबंधन पर समग्र कोर्स न होकर केवल दी जाने वाली सेवाओं पर ही केंद्रित होता है। परामर्शदाताओं को बैंकिंग उद्योग की हालिया प्रगति के बारे में अद्यतन जानकारियां होनी जरूरी हैं। निरंतर रूप से अपने ज्ञान में इज़ाफा करने के लिए भी परामर्शदाताओं को अपडेट रहने की जरूरत होती है। प्रशिक्षित परामर्शदाता की नियमित आपूर्ति के लिए इंडिअन इंस्ट्यिूट ऑफ बैंकिंग एवं फिनैंस द्वारा साख परामर्श और ऋण प्रबंधन पर विशेष कोर्स का आयोजन किया जाना तथा व्यावसायिक संस्थानों द्वारा बैंकिंग तथा वित्त से जुड़े कोर्सिज किए हुए लोगों को लेना भी उपयोगी हो सकता है।
प्रचार
सभी संस्थानों लोगों को विभिन्न योजनाओं/सुविधाओं के बारे में जागरूक बनाने पर जोर देने के लिए प्रचार के सभी रूपों, जैसे प्रेस कॉन्फे्रंस, वर्कशॉप, प्रकाशन, वेबसाइट, रोड शो, मोबाइल यूनिट, ग्राम मेला इत्यादि का इस्तेमाल करेंगे। योजनाबद्ध तरीके से आगे बढऩे के लिए वित्तीय साक्षरता तथा परामर्श पर एक स्थायी समिति का गठन रिजर्व बैंक द्वारा किया गया है, जिसमें रिजर्व बैंक के सदस्य, नाबार्ड, आइबीए, बीसीएसबीआइ, सीआइबीआइएल, तथा उस क्षेत्र में कार्य करने वाले एनजीओ तथा अन्य उपभोक्ता संगठन शामिल हैं। बैंक के विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं के लिए ग्राहकों में जागरूकता लाने हेतु कृषि अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है तथा बचत एवं क्रेडिट कार्ड की अवधारणा, न्यूनतम शुल्कों का प्रभाव इत्यादि से लोगों को परिचित कराने हेतु उन्हें शिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण एवं जागरूकता कैम्पों का आयोजन किया जाता है। ये परामर्श केन्द्र मुख्य रूप से बैंकों के परिसरों न होकर वहां होने चाहिए जहां किसानों एवं व्यापारियों को पहुंचने में सुविधा हो।
साख परामर्श केन्द्रों से जुड़ी परेशानियां
हालांकि यह प्रयास बहुत अच्छा है, इन केंद्रों के साथ कुछ व्यवहारिक अड़चने भी हैं। पहली और बड़ी परेशानी तो इन केंद्रों के पास किसी तरह का अधिकार न होना है। बैंक या ग्राहक दोनों ही इनकी सलाह मानने इंकार कर दें तो ये केंद्र कुछ नहीं कर सकते। एक ऐसे ही केंद्र में लम्बे समय से काम करने वाले एक अधिकारी के अनुसार 'भारत जैसे देश में नि:शुल्क सलाह किसी को नहीं चाहिए, इन परेशान लोगों को और पैसा या सौ प्रतिशत ऋण माफी चाहिए हमारी सलाह नहीं। इन प्रयासों को लोकप्रिय बनाने हेतु भी कोई प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है, कुछ केंद्रों को खुले तीन से चार माह हो चुका है मगर वहां आज तक एक-दो लोग ही बहुत मुश्किल से पहूंचे हैं। इन केंद्रों में ऐसे सेवा-निवृत अधिकारियों को बैठा रखा है जिनमें न तो ज्यादा भाग-दौड़ करना उत्साह है और न ही समस्या को सुलझाने की बेहतर समझ। खुद लीड बैंकों की भी ये प्रथमिकता में नहीं है, इसलिए ही तीन साल में 640 केंद्रों की बजाए देशभर में 100 से भी कम केंद्र ही खोले गए हैं। बेहतर होता कि इन केंद्रों में राजस्व विभाग का भी एक अधिकारी बैठाया जाता जो किसानों के विवादों और विभाग की कार्रवाही को समझकर उचित समाधान दे सकता था।

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