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Tuesday, July 31, 2012

भण्डारण में बंटाधार

हरित क्रान्ति के बाद भले ही हमें भुखमरी से निजात मिल गई है, पर उस क्रान्ति के परिणामस्वरूप उत्पादित अन्न को आज तक सहेजना नहीं सीखा। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र की तीन बड़ी एजेंसियां भारतीय खाद्य निगम (एफ सी आई), केंद्रीय भण्डारण निगम (सी.डब्ल्यू.सी.) और राज्यों के भण्डारण निगम (एस डब्ल्यू सी एस)देश में व्यापक पैमाने पर भण्डार एवं भण्डारण क्षमताओं को निर्मित करने में व्यस्त हैं। इसके अलावा सरकार ने निजी क्षेत्र को भी गोदाम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, फिर भी नतीजे हमारे सामने हैं और हर साल लाखों टन अनाज खुले में पड़ा खराब हो जाता है।
भारतीय खाद्य निगम के पास सबसे बड़ी कृषि गोदाम प्रणाली है जिसकी सम्पूर्ण भारत में स्थित लगभग 1450 से अधिक गोदामों में 2.5 करोड़ टन से अधिक भण्डारण क्षमता है, जिसमें निजी एवं किराए के गोदाम शामिल हैं। सी.डब्ल्यू.सी. इस समय यह पूरे देश में 514 गोदाम चलाता है जिनकी भण्डारण क्षमता सवा करोड़ टन है। भारतीय खाद्य निगम अपने भण्डारों का इस्तेमाल मुख्य रूप से खाद्यान्नों के लिए ही करता है, लेकिन सी.डब्ल्यू.सी. और एस.डब्ल्यू.सी. की भण्डारण क्षमताओं का इस्तेमाल खाद्यान्नों के अलावा खाद और अन्य वस्तुओं के लिए भी किया जाता है। इसके अलावा भारत सरकार ने एक अप्रेल 2001 से 'ग्रामीण भंडारण योजनाÓ की शुरुआत की थी जो 31 मार्च 2012 तक जारी रही। इस योजना में  नगर निगम, फेडरेशन, कृषि उत्पाद मार्केटिंग समिति, मार्केटिंग बोर्ड तथा ऐग्रो प्रॉसेसिंग कॉरपोरेशन के अलावा कोई भी व्यक्ति, किसान, उत्पादकों के समूह, पार्टनरशिप व एकल स्वामित्व वाले संगठन, एनजीओ, स्वयं सहायता समूह, कंपनियां, कॉरपोरेशन, सहकारी निकाय, स्थानीय निकाय कोई भी गोदाम बना सकता था। इस योजना के तहत देश भर में सैंकड़ों गोदम बने और बन भी रहे हैं।
इन प्रयासों को देखते हुए नहीं लगता कि भण्डारण जैसे जरूरी और संवेदनशील मुद्दे पर सरकार कोई कोताही बरत रही है। इतना होने के बावजूद भी अगर हर साल खाद्यान्न खुले में पड़ा खराब हो रहा है तो वजह क्या है? एक कारण तो यह समझ आता है कि हर साल अनाज की पैदावार इतनी बढ़ रही है जिसके अनुपात में गोदाम कम पड़ जाते हैं। अगर गत पांच वर्षों के मात्र गेहूँ उत्पान के आंकड़े पर नजर डालें तो पता लगता है कि 2007 में 9.32 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि हुई थी उसके चार साल बाद 2011 में 7.5 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली। हालांकि शेष वर्षों में केवल 2010 को छोड़ कर गेहूँ उत्पान वृद्धि प्रतिशत हमारी आबादी बढऩे के 1.41 प्रतिशत से हमेशा दोगुना ही रहा है।
अच्छे उत्पादन और सरकारी एजेंसियों की तरफ से भारी खरीद के चलते भारतीय खाद्य निगम के प्रशासनिक नियंत्रण में खाद्यान्न का भंडार 25.64 प्रतिशत बढ़कर अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है। एफसीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि 1 जून 2012 को केंद्रीय भंडार में अनाज की मात्रा बढ़कर 824.1 लाख टन पर पहुंच गई जबकि एक साल पहले इसी अवधि में कुल 656 लाख टन अनाज का भंडार था। कुल अनाज में मात्र 1 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले मोटे अनाज को छोड़ भी दें तो अनाज भंडारण जबरदस्त बढ़ा है। हालांकि मोटे अनाज का भंडार 23 प्रतिशत घटकर 0.9 लाख टन पर आ गया है जबकि गत वर्ष 1 जून 2011 को यह 1.2 लाख टन था।
एफसीआई हर दिन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करीब 34 लाख टन गेहूं की खरीद कर रहा है और 1 जून तक 342.7 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 80 लाख टन ज्यादा है। नियमों के मुताबिक 1 जुलाई 2012 तक एफसीआई को बफर स्टॉक के तौर पर 98 लाख टन और रणनीतिक रिजर्व के लिए 20 लाख टन चावल होने चाहिएं, तथा इसी आधार पर 171 लाख टन व 30 लाख टन गेहूं भी होना चाहिए, मगर इन दोनों वस्तुओं का उपलब्ध स्टाक करीब 250 प्रतिशत ज्यादा है। हालांकि सरकार ने दो साल की गारंटी योजना के तहत निजी गोदामों के किराए पर लेने में उदारता बरती है क्योंकि सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन और स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन बहुत ज्यादा जगह उपलब्ध नहीं करवा रहे है। सीडब्ल्यूसी के पास जहां 1 करोड़ टन से कम अनाज के भंडारण के लिए जगह है, वहीं राज्यों में एसडब्ल्यूसी के पास इतनी जगह नहीं है कि खरीदे गए और खरीदे जाने वाले अनाज का भंडारण कर सकंे। गोदामों की किल्लत से जूझ रहे एफसीआई ने अपने क्षेत्रीय प्रबंधकों को दो साल के लिए निजी गोदाम अधिकतम 4.16 रुपये प्रति क्विंटल प्रति माह के हिसाब या मजबूरी में 5.21 रुपये प्रति क्विंटल प्रति माह तक किराए पर लेने के लिए अधिकृत किया है।

Friday, July 27, 2012

भंडारण में सरकार को सुझाव

हरित क्रांति और कृषि क्षेत्र में लगातार अनुसंधान से हमने पैदावार तो बढ़ाली लेकिन अनाज भंडारण की समस्या आज भी बनी हुई है। हर नयी फसल आते ही इस समस्या की गंभीरता की ओर ध्यान भी जाता है। किन्तु ढाक के तीन पात की तरह स्थिति जस की तस बनी रहती है। देश में अनाज भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण प्रतिवर्ष 58000 करोड़ रुपए मूल्य से अधिक का अनाज नष्ट हो जाता है। गत वर्ष इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए ऐसे अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट देने का निर्देश दिया था। हालांकि केन्द्र सरकार द्वारा पिछले दो वर्षों से भंडारण क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं जिसमें निजी क्षेत्र में गोदाम निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कुछ योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। लेकिन इसके बावजूद अभी तक कोई उल्लेखनीय प्रगति हो नहीं पायी है।
 देश में केंद्र स्तर पर केन्द्रीय भंडारण निगम और भारतीय खाद्य निगम अनाज भंडारण की दो सरकारी एजेन्सियाँ हैं और इनकी (अपनी तथा किराये पर ली गई) कुल भंडारण क्षमता क्रमश: 10.09 तथा 33.60 मिलियन टन है लेकिन व्यवहार में इनकी इस पूरी क्षमता का उपयोग हो नहीं पाता और समझा जाता है कि 80 प्रतिशत के करीब ही वास्तविक भंडारण क्षमता मिल पाती है। इससे भी बुरा हाल शीत भंडारण गृहों का है जिनकी अत्यन्त अपर्याप्त संख्या एवं क्षमता के कारण सब्जी और फल पैदा करने वाले किसान कभी भी अपनी उपज का पूरा मूल्य नहीं ले पाते।
इस पसमंजर में संसद की खाद्य एवं आपदा प्रबंधन सम्बन्धी स्थायी समिति ने भंडारण की समस्या को हल करने के लिए सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं। पहला यह है कि भंडारण का निजीकरण व विकेन्द्रीकरण कर दिया जाए। दूसरा सुझाव था कि अनाज वितरण व्यवस्था में सुधार किया जाए।  समिति का मानना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (साविप्र)की प्रक्रिया में थोड़ा सा बदलाव लाकर इस दिक्कत से निजात पायी जा सकती है। समिति के अनुसार साविप्र के तहत अभी कार्डधारकों को जहाँ हर माह खाद्यान्न दिया जाता है उसकी जगह अगर छ: माह का राशन इकट्ठा दे दिया जाए तो इससे न सिर्फ गोदामों में एकमुश्त जगह खाली हो जाएगी बल्कि उसके रख-रखाव पर आने वाले खर्च में भी कमी आएगी। समिति का अनुमान है कि सरकारी गोदामों में एक किलो अनाज साल भर रखने पर 4 रु. 40 पैसे का खर्च आता है। इस अनाज को अगर छ: माह पहले ही वितरित कर दिया जाए तो 2 रु. 20 पैसे प्रति किलो की बचत होगी, जिसे कार्डधारकों को अनाज सस्ती दर पर दिया जा सकता है। देश के सभी कार्डधारकों को दिए जाने वाला छ: माह का राशन अनुमानत: 216 लाख टन बनाता है। यह जगह गोदामों में नया अनाज रखने हेतु खाली हो जाएगी और इस मद में सरकार द्वारा निजी गोदामों को दिया जा रहा किराया भी बचेगा।
एक अन्य सुझाव यह है कि सरकार जो अनाज किसानों से खरीदती है, आपसी अनुबंध के जरिए उसकी आधी कीमत पेशगी के तौर पर किसान को देदी जाए और अनाज किसान के ही पास रहने दिया जाए। निश्चित समय सीमा के बाद सरकार अनाज रखने वाले किसान को प्रति किलो 4रु.40 पैसे का सालाना के अनुसार भुगतान भी कर सकती है। यह एक उपयोगी सुझाव है जिससे दोहरा मंतव्य पूरा हो सकता है लेकिन इसे व्यवहार में लाने में कई कठिनाइयाँ आ सकती हैं। जैसे, किसान अनाज की कितनी हिफाजत रख सकेगा, पेशगी लेकर अगर वह बाद में अनाज सरकार न दे तो?
इस कार्य में सरकारी स्टॉफ व परिवहन बहुत जरूरत पड़ेगी आदि-आदि। लेकिन यदि ऐसा हो जाए तो बिना किसी अतिरिक्त खर्च के सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित दाम दे सकती है और भण्डारण के झमेले से भी बच सकती है। इसका एक दूसरा पेच यह भी है कि अनाज की खरीद से लेकर परिवहन व भंडारण तक के कार्य में निजी क्षेत्र का भारी दखल है और यह लॉबी बहुत प्रभावशाली भी है। इसलिए ऐसे किसी भी परिवर्तन का वह हर हाल में विरोध ही करेगी।
केन्द्र सरकार ने भंडारण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से ग्रामीण भंडारण योजना चलाई हुई है जिसके तहत निजी क्षेत्र गोदाम बनाकर सरकार को किराये पर देता है और सरकार उसे अनुदान के साथ-साथ एक निश्चित समयावधि (पहले सात साल थी जिसे अब दस साल कर दिया गया है) के लिए किराये का अनुबंध भी करती है। गत वर्ष अप्रेल में केन्द्रीय खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री के.वी. थॉमस ने ऐसे पंजीकृत गोदामों में रखे गए किसानों की उपज की रसीद को हुंडी की मान्यता प्रदान करते हुए घोषणा भी की थी कि किसान इन रसीदों के आधार पर न सिर्फ बैंकों से कर्ज प्राप्त कर सकेंगे बल्कि जरुरत पडऩे पर रसीद को उसके अंकित मूल्य पर बेच भी सकेंगे। किसानों के हित में यह एक क्रांतिकारी कदम था लेकिन यह योजना मार्च 2012 में समाप्त भी हो गई और निजी क्षेत्र में वांछित गोदाम निर्माण भी नहीं हुए। गोदाम बनवाना तो वैसे भी सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक अगर कानून की शक्ल लेता है तो अनाज भंडारण सरकार की बड़ी मजबूरी बन जाएगी। ऐसे में भंडारण को केंद्रीयकृत करने के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाना ही पड़ेगा।

Thursday, July 26, 2012

ऊगाना ही नहीं, बचाना भी आना चाहिए

कहा जाता है कि भारत में खेती का इतिहास करीब 10 हजार साल पुराना है। कुछ इतिहासकार तो यहां तक दावा करते हैं कि दुनिया को खेती करना सिखाया ही भारत ने है। पता नहीं इन दावों में कितनी सच्चाई है, पर यह बात सवा-सोलह आने सच है कि अतीत की गौरव-गाथा हारे हुए लोग ही गाते हैं। वर्तमान भारत उपज के मामले में बड़े देशों से तो छोडि़ए पाकिस्तान, बंग्लादेश और बर्मा तक से पीछे है। इन देशों में मौजूद संसाधन और राजनैतिक हाताल को देखते हुए कई बार आश्चर्य भी होता है कि ये भी हम से आगे हैं? साथ ही भण्डारण की स्थिति देखते हुए लगता है कि चलो अच्छा है, कम पैदा होता है इसलिए कम ही खराब होता है।
अन्न ऊपजाना और उसे सहेज कर रखना दोनों बिलकुल अलग ही विज्ञान हैं। हम दुनिया भर से उपज बढ़ाने की तकनीक तो ले आए, पर उपजाए अन्न को सहेजने की जरूरत ही नहीं समझी। जिस समय हम विदेशों से अन्न उत्पादन तकनीक ला रहे थे, उस समय खाने के लाले पड़े हुए थे, अन्न सहेजना तो हमारे ख्वाब में ही नहीं था। आश्चर्य तो जब होता है जब 40 साल बाद भी हम उसी वहम में जिन्दां हैं। माना हमारे देश की कृषि मानसून और कई अन्य कारणों से अनिश्चित रहती है, अन्न की उपज पर्याप्त न होने पर हमें विदेशी मुद्रा खर्च कर विदेशों से अन्न मांगने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
हमारी कई दोषपूर्ण नीतियों की वजह से हम विश्व के 20-22 देशों के ही उपर हैं। कृषि क्षेत्र में पर्याप्त धन व्यय करने के पश्चात हमारी फसल उत्पादन तो बढ़ा है, और गत कुछ वर्षों में उत्पादन आशातीत भी रहा है परन्तु अभी दो साल पहले तक टनों अन्न वर्षा में भीग कर सड़ गया था और कमोबेश यही स्थिति आज भी है। तब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई कि यदि गेहूं को रखने के साधन आपके पास नहीं तो गरीबों में बाँट दो। विडम्बाना ही है कि जितना अन्न हमारे यहाँ व्यर्थ हो जाता है उतनी तो कनाडा जैसे देश की कुल उपज है। अपनी इस राष्ट्रीय समस्याओं के लिए एक सीमा तक तो हम खुद ही जिम्मेदार हैं। विगत 6-7 सालों से यह गलती हम बार-बार दोहरा रहे हैं तभी तो कहा गया कि एक या दो बार हो जाए तो गलती कहलाती है, परन्तु यदि बार बार ऐसा हो तो वह अक्षम्य अपराध है।

Wednesday, June 13, 2012

उपज को कितना समर्थन देता है, समर्थन मूल्य?

किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए झा कमेटी की सिफारिश के आधार पर वर्ष 1965 में कृषि मूल्य व लागत आयोग का गठन किया गया था। मण्डी में किसानों की फसल को बिचौलिये कम कीमत पर खरीद लेते हैं, इसे ध्यान में रखते हुए ही सरकार आयोग की सिफारिश पर रबी और खरीफ की करीब 21 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। एफसीआई और सीसीआई जैसी सरकारी एजेंसियां उन समर्थन मूल्यों पर खरीद भी करती हैं। पिछले सात साल से करीब सभी अनाजों का समर्थन मूल्य दोगुना हो गया है। धान का समर्थन मूल्य 2004-05 की तुलना में 560-590 रुपए से बढ़कर 1,250 रुपए और गेहूं का समर्थन मूल्य 640 रुपए से बढ़कर 1,285 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। इस दौरान गन्ने का मूल्य भी 74.5 रुपए से बढ़कर 139. 12 क्विंटल प्रति टन पर पहुंच गया। सरकार ने दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए इस साल चने और मसूर का समर्थन मूल्य 2,800 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है।
पहली नजर में यह नीति किसानों के लिए लाभदायक लगती है, किन्तु हकीकत बिल्कुल उलट है। बाजरा, ज्वार, मक्का, जौ जैसे मोटे अनाजों में आजतक कुल उपज का 1 प्रतिशत भी कभी खरीदा नहीं गया। इसी तरह चना, मूंग, उड़द आदि दलहनी फसलों के लिए भी समर्थन मूल्य घोषित तो किए जाते हैं, किन्तु उनकी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं की जाती। आश्चर्य तो तब होता है जब यही दालें विदेशों से आयात करली जाती हैं और किसान को बाज़ार के भरोसे छोड़ दिया जाता है। आयातित अनाज आयोग के क्षेत्राधिकार में नहीं है, इसलिए आयोग इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं करता। कमोबेश यही स्थिति बाकी फसलों की भी है, कपास की खरीद भी तब होती है जब विदेशों से खरीद के आदेश मिले होते हैं, अन्यथा सीसीआई हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती है। इसका ताजा उदाहरण है इस वर्ष सीसीआई द्वारा राजस्थान से साढ़े 23 हजार, पंजाब से 65 हजार क्विंटल कपास की खरीद की जबकि हरियाणा में खरीद ही नहीं हुई। इसकी तुलना में गत वर्ष राजस्थान से 3 लाख, पंजाब से 5 लाख और हरियाणा से करीब 4 लाख क्विंटल कपास खरीदी गई थी।
दरअसल अभी तक केन्द्रीय कृषि आयोग के आधे-अधूरे ढांचे में सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी तथा राजनीतिक लोग ही शामिल हैं। इसमें कृषि विशेषज्ञों, किसानों तथा प्रदेशों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। कहने को इसमें एकाध किसान प्रतिनिधि भी होते हैं लेकिन वे या तो फार्म-संस्कृति वाले होते हैं या राजनेताओं के चहेते। आयोग की समितियों पर दूसरा गम्भीर आरोप यह है कि ये कभी भी मुख्यालयों से 150-200 किलोमीटर दूर जाकर सीमांत किसानों से उनका दु:ख-दर्द और कृषि लागत पूछने की जहमत नहीं उठाती। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अगर किसान को उसकी जोत पर न्यूनतम आमदनी की गारंटी नहीं दे सकती तो उसे चाहिए कि कम से कम 10 साल पहले के किसी भी कालखंड मूल्य को मानक मान ले और जिस अनुपात में आवश्यक वस्तुओं के बाजार भाव बढ़े हैं, उसी के अनुरूप किसानों के उत्पाद के भी दाम तय किए जाएं।
किसान अपनी दैनिक जरूरत की कुछ ही चीजें तो पैदा कर पाता है बाकी तो उसे भी बाजार से ही खरीदनी पड़ती है। प्रसंगवश यह जानकरी चौंकाने वाली होगी कि वर्ष 1967 में एक क्विंटल गेंहू के बदले 121 लीटर डीजल आ जाता था लेकिन वर्तमान में यह सिर्फ 24 से 28 लीटर ही मिल पाता है। उस वक्त ढाई क्विंटल गेंहू में एक तोला सोना खरीदा जा सकता था लेकिन आज देश का 95 प्रतिशत किसान अपना सारा गेंहू बेचकर भी एक तोला सोना खरीदने के बारे में नहीं सोच सकता। यह हाल तब है जब शुरु से ही उपज का दाम लगाने की जिम्मेदारी सरकार ने ले रखी है। आयोग की सिफारिशों के आधार भी परस्पर विरोधी हैं।
आयोग समर्थन मूल्य की घोषणा जिन आधारों पर करता है वे कुछ इस तरह हैं- (क) उत्पादन की लागत, (ख) उत्पादन के आदान मूल्यों में परिवर्तन, (ग) बाजार में मूल्यों की स्थिति, (घ) उपज की मांग व आपूर्ति, (ड) उद्योगों पर होने वाले नकारात्मक/सकारात्मक प्रभाव, (च) सामान्य मूल्य स्थिति पर प्रभाव, (छ) किसान द्वारा चुकाए गए और प्राप्त किए गए मूल्यों का अनुपात, (ज) अंतरराष्ट्रीय मूल्य स्थिति, (झ) आम लोगों के जीवनयापन पर मूल्यों पर प्रभाव।  सिफारिश के ये आधार परस्पर विरोधी, बिखरे हुए एवं अस्पष्ट हैं। आयोग इनमें से किन्हीं भी बिन्दुओं को अधिक महत्त्व देकर अपनी सिफारिश कर सकता है। इन कृषि मूल्यों को निश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन हेतु किए जाने वाले श्रम के पारिश्रमिक, प्रयुक्त उपकरणों व उनकी घिसावट पर किए जाने वाले खर्च, कृषि में लगने वाली पूंजी तथा भू-पूंजी और इन दोनों के ब्याज की ओर ध्यान नहीं दिया गया। आयोग तब तक कृषि उपजों का सही आकलन कर ही नहीं सकता, जब तक प्राकृतिक प्रकोप जैसे सूखा, बाढ़, ओले, बीमारियां, बेमौसमी बरसात आदि जोखिमों के सम्बंध में विचार कर लागत का लेखा तैयार नहीं किया जाता। वास्तविकता तो यह है कि आयोग इन आपातकालिक आपदाओं को महत्त्व ही नहीं देता। ऊपर से उत्पादन लागत के आंकड़े भी दो वर्ष पुराने होते हैं, इस बीच लागत काफी बढ़ चुकी होती है।
समर्थन मूल्य की सिफारिश करते समय किसान को लागत पर कितना प्रतिशत लाभ दिया जाए, इसके लिए भी कोई ठोस दिशा-निर्देश आयोग के पास नहीं है। उदाहरण के लिए देखें कि आयोग ने 1967-68 में गेहूं की लागत 50.02 रुपए प्रति क्विंटल मानकर 76.00 रुपए प्रति क्विंटल का मूल्य तय किया जिसमें किसान को करीब 52 प्रतिशत लाभ था। जो बाद के वर्षों में घटकर 1975-76 में 5.68 प्रतिशत, 1977-78 में 3 प्रतिशत, 1980-81 में 4.25 प्रतिशत तथा 1983-84 में 10 प्रतिशत रह गया। गत वर्ष 2010-11 के लिए गेहूं का समर्थन मूल्य 1100 रुपए से बढ़ाकर 1120 रुपए किया गया था, जिसमें किसान को लाभ मात्र 1.81 प्रतिशत ही है, जबकि इस वर्ष कृषि में प्रयुक्त होने वाली सामग्री के मूल्य में वृद्धि 10 प्रतिशत से अधिक हो चुकी थी। आयोग द्वारा सिफारिश के आधार पर घोषित समर्थन मूल्य सामान्यतया बाजार भाव से नीचे ही रहते हैं। गजब तब होता है जब समर्थन मूल्य से दो गुने या उससे भी अधिक मूल्यों पर अनाजों का विदेशों से आयात किया जाता है।
इस ढांचे में सुधार के लिए हर प्रदेश के गैर-सरकारी कृषि विशेषज्ञों को, जिनकी संख्या कुल संख्या की एक तिहाई हो तथा पंजीकृत किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की संख्या भी कुल संख्या की एक तिहाई तथा शेष सरकार द्वारा नामांकित व्यक्तियों को मिलाकर मूल्य आयोग के गठन किए जाने पर लागत मूल्य का निर्धारण वास्तविकता के निकट होने की संभावना बनेगी। सरकार किसी भी एक वर्ष को आधार वर्ष मानकर सभी प्रकार की उपजों का लागत मूल्य सभी प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर तय करे, फिर उस लागत को मूल्य सूचकांक के साथ जोड़ दे, जिससे प्रतिवर्ष न्याय-संगत समर्थन मूल्य घोषित करने की कारगर पहल हो सके।

Monday, June 11, 2012

कृषि आदानों पर गुण-नियत्रंण का गोरखधंधा

कृषि उत्पादन में आदानों की गुणवत्ता का महत्त्व किसी से छुपा नहीं है। कृषि विभाग भी मानता है कि कृषि आदानों की कीमतों में वृद्धि के कारण विक्रेताओं द्वारा अमानक और नकली कृषि आदान बेचने की सोच पैदा हो जाती है। बीज, उर्वरक एंव कीटनाशी रसायनों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अधिनियम/नियम/ आदेश पारित किए जाते हैं। गुणवत्ता युक्त बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बीज अधिनियम 1966, बीज नियम 1968, बीज नियंत्रण आदेश 1983, उर्वरकों के लिए उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 तथा कीटनाशी रसायनों के लिए कीटनाशी अधिनियम 1968, कीटनाशी नियम 1971 बने हुए हैं।
इन कानूनों के तहत सभी राज्यों में कृषि आदानों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कृषि अधिकारियों को निरीक्षक की शक्तियां मिली हुई हैं। समस्त निरीक्षक राज्य के विभिन्न उपजिलों/जिलों में पदस्थापित है एवं इनके द्वारा अपने क्षेत्र में बिक रहे कृषि आदानों की उपलब्धता एवं गुणवत्ता सुनिश्चित करने की पूर्ण जिम्मेदारी होती है। ये निरीक्षक अपने अधिकारिता क्षेत्र में कार्यरत समस्त विक्रय प्रतिष्ठानों का निरीक्षण कर कृषि आदान के नमूने ले सकते हैं। सम्बन्धित विक्रेताओं को बिलबुक रखना, स्टाक रजिस्टर भरना, बोर्ड पर मूल्य सूची और स्टॉक प्रदर्शित करना, उनके द्वारा क्रय किए गए आदान के स्रोत भण्डारण आदि कार्य इस व्यवसाय में सुनिश्चित करने होते हैं। इनमें अनियमितता पाए जाने पर कानून के तहत सम्बन्धित निर्माताओं और विक्रेताओं के विरूद्ध न्यायिक कार्यवाही की जाती है। निरीक्षण के दौरान सम्बन्धित निर्माता और विक्रेताओं के प्रतिष्ठान पर उपलब्ध कृषि आदानों के नमूने लेकर राजकीय परीक्षण प्रयोगशालाओं को भिजवाए जाते हैं। बीज, खाद और कीटनाशकों के नमूने अमानक पाए जाने पर सम्बधित कानूनों के तहत व्यवसाय करने वालों के विरूद्ध नियमानुसार कार्यवाही भी की जाती है। यहां तक की स्थिति बहुत ही आदर्शवादी नजर आती है। घटिया खाद, बीज और कीटनाशी बेचने और बनाने पर सजा। यानी किसान के हितों का पूरा ख्याल। इसे समझने के लिए एक उदाहरण की जरूरत होगी, उसके लिए देश भर के सभी जिलों के कृषि आदानों के आंकड़े नहीं चाहिए। इसके लिए हम देश का एक जिले गंगानगर को लेगें और विशेषतय: बीज की बात करेंगे, क्योंकि सारे राजस्थान में जितने बीज उत्पादक हैं उससे दोगुने अकेले इस क्षेत्र में हैं। सारे देश की तरह यहां भी कृषि अधिकारी बीजों का नमूना दुकान-दुकान जाकर भरते हैं। बीज का एक नमूना तीन किलो का भरा जाता है, जिसे एक-एक किलो के तीन हिस्सों में बांट कर एक बीज विक्रेता के यहां, दूसरा जांच के लिए सरकारी प्रयोगशाला में और तीसरा विवाद की सूरत में दूबारा जांच के लिए संयुक्त निदेशक कृषि के कार्यालय में जमा करवाया जाता है। प्रयोगशाला 60 दिन में बता देती है कि यह नमूना मानक है या अमानक।
किसान हितों का ध्यान रखने के लिए बनाया गया कानून यहां आकर दम तोड़ देता है। इन 60 दिनों में बीज विक्रेता अपना सारा बीज बेच लेता है। अब अगर जांच रिर्पोट अमानक आ भी जाए तो फूटे किसान के। व्यापारी कानून से मिले हुए अपने हक के तहत दूबारा जांच के लिए दूसरी प्रयोगशाला में चला जाता जहां से रिर्पोट आती है 90 दिन में। जांच के इन पांच महिनों में किसान इस बीज से उपजी फसल बाजार में बेचकर फारिग भी हो चुका होता है। अब अगर दूसरी रिर्पोट भी अमानक आ जाए तो कृषि विभाग कानून के अनुसार मामले को अदालत के हवाले कर देता है, जहां वर्षों बाद व्यापारी को पहली गलती पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है। दूसरी बार यह गुनाह साबित होने पर 1 हजार तक का जुर्माना और 6 माह तक की कैद या दोनों भी हो सकते हैं। बीज नियंत्रण आदेश 1983 में सजा कम से कम 1 वर्ष है। (यह दीगर बात है कि आज तक किसी भी बीज बनाने और बेचने वाले को एक दिन की भी सजा नहीं हुई है।)
कानून किसके हक में? जब इस पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बता कर राजस्थान सरकार के कृषि विभाग में संयुक्त निदेशक गुणवत्ता नियंत्रण, जगपाल सिंह से जब पूछा गया कि इस सारी कवायद का मतलब ही क्या है जब किसान को कोई फायदा ही नहीं है? तो उन्होंने जवाब के बदले सवाल किया कि जो अधिकार हमें कानून से मिले हैं, उससे ज्यादा हम कर भी क्या सकते हैं? नाम नहीं छापने की शर्त पर कृषि आदान के कुछ विक्रेता कहते हैं कि यह कानून कृषि विभाग की कमाई का बड़ा साधन है। इस बात की पुष्टि कृषि विभाग से मिले ये आंकड़े भी करते हैं। गंगानगर जिले में करीब 650 से ज्यादा बीज विक्रेता हैं और एक बीज विक्रेता की दूकान पर 50 किस्मों और उत्पादकों के बीज होते हैं। अगर उनके यहां से साल में एक वस्तु का एक नमूना भी भरा जाए तो पांच साल में 3250 नमूने भरे जाने चाहिए थे लेकिन विभाग द्वारा विगत पांच वर्षों में बीज के मात्र 680 नमूने ही भरे गए। जिनमें सिर्फ 48 अमानक पाए गए और 37 नमूनों की आज तक प्रयोगशाला से रिर्पोट ही नहीं आई।
विभाग इसके पीछे स्टाफ की कमी को कारण बताता है और व्यापारी कहते हैं कि इसके लिए विभाग के अधिकारियों की बाकायदा सेवा की जाती है। इसके बाद खानापूर्ति के लिए कुछ नमूने लिए जाते हैं, वह भी व्यापारी की इच्छा और पसंद के अनुसार। यहां ध्यान रखा जाता है कि घटिया कृषि आदान बनाने वाले संस्थानों के उत्पादों के नमूने नहीं भरे जाते, और जो नमूने लिए भी जाते हैं उन्हें एक साधारण कपड़े की थैली में डालकर संयुक्त निदेशक के कार्यालय में ऐसे ही पटक दिया जाते हैं, जो कुछ समय में ही फंगस लगकर खराब हो जाते हैं। नमूने किस प्रयोगशाला में भेजे जाएगें और उस नमूने का गुप्त नम्बर क्या है? यह भी आसानी से जाना जा सकता है और परिणाम को इच्छानुसार बदलवाया भी जा सकता है। भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत कहते हैं कि इस कानून से विभाग और व्यापारी दोनों राजी हैं, बात तो किसान के हितों की है, उसके नाम पर होने वाली इस लूट में हमेशा किसान ही खरबूजा साबित हुआ है। बीज अमानक निकल जाए तो किसान उपभोक्ता अदालत में जाकर भले ही कुछ राहत पा सकता है बीज कानून तो केवल भ्रष्ट अधिकारियों की जेब भरने का साधन मात्र है।

Friday, June 8, 2012

बजट के बहाने से

पिछले महीन केंद्र और राज्य सरकारों ने अगले साल के लिए योजनाए बनाई और बजट पेश किया। बजट में चाहे कुछ भी आंकड़े भरे हों हमारा ध्यान सिर्फ इस पर है कि खेत किसान के लिए क्या है। कारण बहुत साफ है कि तमाम बड़े-बड़े उद्योग-धंधों और कम्प्यूटर क्रांति के बाद भी अब तक देश की 60 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर ही निर्भर है। विडम्बना यह है कि साठ फीसदी लोगों को रोज़गार देने वाले इस क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में योगदान लगातार घटता जा रहा है। आजादी के समय कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 50 प्रतिशत था, जो नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2011-12 में गिरकर 13.9 प्रतिशत रह गया है।
हरित क्रान्ति से लेकर आज तक अरबों-खरबों रुपए कृषि के नाम पर खर्च करने के बावजूद हम अन्न उत्पादन के क्षेत्र में कहां खड़े हैं, जानने के लिए एक नजर अपने पड़ौसी देशों के खाद्यान्न उत्पादन के इन आंकड़ो पर भी डाल लें। हमारे देश की प्रमुख खाद्य फसलों का उत्पादन पड़ौसी देश चीन की तुलना में लगभग आधा है। चीन जैसे बड़े देश से तुलना न भी करें तो भी यह जानकारी और भी चौंकाने वाली हो सकती है कि हमारे यहां मक्का और दलहन जैसी फसलें भी पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार से भी कम पैदा होती है। कृषि मंत्री शरद पवार से संसद में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर से यह आंकड़ें सामने आए हैं कि भारत में चावल की उत्पादकता 3,264 किलो प्रति हेक्टेअर है, जबकि चीन में यह 6,548 किलो है और बांग्लादेश में 4,182 किलो, म्यांमार में 4,123 किलो प्रति हेक्टेअर है। गेहूं की उपज के मामले में भी चीन में उपज करीब 4,748 किलो प्रति हेक्टेअर है जबकि हमारे देश में यह 3,264 किलो प्रति हेक्टेअर ही है। मक्का उपज में बांग्लादेश शीर्ष पर है, जहां इसकी उत्पादकता 5,837 किलो प्रति हेक्टेअर है, 5,459 किलो के साथ चीन दूसरे तथा 3,636 किलो के साथ म्यांमार तीसरे पर और 3,558 किलो प्रति हेक्टेअर के साथ पाकिस्तान चौथे स्थान पर है जबकि भारत में यह आंकड़ा मात्र 1,958 किलो प्रति हेक्टेअर ही है। हमारा लगभग यही हाल दलहनी फसलों के मामले में भी है।
इसके बाद बात करते हैं खेती लागत और बाजार भावों की। रासायनिक कीटनाशकों और खाद के अंधाधुंध और अवैज्ञानिक उपयोग से जहां किसान एक ओर क़र्ज़ में डूब रहा है वहीं दूसरी ओर बाजार भाव अकसर उसे धोखा दे जाते हैं। 300 रूपए किलो बिकने वाला लहसुन कब 5रूपए पर आ जाए कहा नहीं जा सकता। गत वर्ष कपास 7 हजार रूपए प्रति क्विंटल तक बिकी वह इस साल 4 हजार रूपए प्रति क्विंटल के आसपास बनी रही। इन हालात को देखते हुए ही शायद यह मांग जोर पकड़ रही है कि रेल बजट की तरह कृषि बजट भी अलग से बनाया जाए। सन 1970 से हरितक्रंाति जो सफर शुरू हुआ था वह आजतक जारी है, मगर शर्म की बात है कि हरित क्रान्ति के इन 42 सालों में हम बंग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान से अन्न उत्पादन में पीछे हैं। ये हाल तब है जब कि इन देशों का कुल बजट भी हमारे कृषि बजट के बराबर नहीं हैं। 
यहां सारा दोष सरकार को भी नहीं दिया जा सकता, इस मामले में हमारा किसान भी कम नहीं है। अगर एक साल कपास की कीमत अच्छी मिल गई तो अगले साल सारे के सारे किसान कपास बीज कर बैठ जाएंगे। खाद, बीज और कीटनाशको की कमी होगी तो काले बाजार से दोगुने-चार गुने दामों पर खरीद कर भी यह बीजाई कपास की ही करेंगे। अगले साल फसल ज्यादा होने से वह भाव नहीं मिलेगा तो सरकार को कोसेंगे। ऐसे में सरकार चाहे लाख कृषि बजट बनाले, जब तक किसान अपने खेत का बजट नहीं बनाएगा तब तक वह जान ही नहीं पाएगा कि खेती करे या छोड़ दे। यही वजह है कि कल तक खेती को सम्मान का काम समझा जाता था, पर वर्तमान में अन्नदाता किसान दूसरे दर्जे के बाबुओं और अफसरों के रहमो-करम पर जिन्दा है।

Monday, April 23, 2012

बरसात की भविष्यवाणी

आज भी हमारे देश में साठ प्रतिशत खेती मानसून पर निर्भर है। ऐसे में किसानों के लिए बरसात के बारे में सटीक भविष्यवाणी का महत्त्व असंदिग्ध है। इसी के मद्देनजर मौसम विभाग वर्ष भर प्रयास रत रहता है कि मानसून के बारे में समय पूर्व जानकरी संबंधित पक्षों को मिलती रहे। हालांकि ये भविष्यवाणियां कितनी सटीक और सही होती हैं यह एक अलग बहस का विषय है। इनके बारे में कहा तो यह भी जाता है कि अगर मौसम विभाग बरसात होने की जानकारी दे तो समझलें कि सूखा पडऩे वाला है। इन लतीफों को अलग रखकर फिलहाल बात करते हैं कि मानसून के बारे ये भविष्यवाणियां किस आधार पर की जाती हैं।
भारत में मानसून अवधि 1 जून से 30 सितंबर तक करीब चार महीने की होती है। इससे संबंधित भविष्यवाणी 16 अप्रैल से 25 मई के बीच कर दी जाती है। तापमान, हवा, दबाव और बर्फबारी आदि कुल 16 तथ्यों के अध्ययन और विशलेषण को चार भागों में बांट कर बरसात के पूर्वानुमान किए  जाते हैं। समूचे भारत के तापमान का क्षेत्रानुसार अध्ययन किया जाता है। मार्च में उत्तर भारत का न्यूनतम तापमान और पूर्वी समुद्री तट का न्यूनतम तापमान, मई में मध्य भारत का न्यूनतम तापमान और जनवरी से अप्रेल तक उत्तरी गोलार्ध की सतह के तापमान को आधार बनाया जाता है। तापमान के अलावा वातावरण में अलग-अलग महीनों में 6 से 20 किलोमीटर ऊपर बहने वाली हवाओं के रुख और गति का भी लेखा-जोखा रखा जाता है। चूंकि वायुमंडलीय दबाव भी मानसून की भविष्यवाणी में अहम भूमिका निभाता है, वसंत ऋ तु में दक्षिणी भाग का दबाव और समुद्री सतह का दबाव जबकि जनवरी से मई तक हिंद महासागर के विषुवतीय क्षेत्रों के दबाव को मापा जाता है। जनवरी से मार्च तक हिमालय के खास भागों में बर्फ का स्तर, क्षेत्र और दिसंबर में यूरेशियन भाग में बर्फबारी का अध्ययन किया जाता है जो मानसून की भविष्यवाणी में अहम किरदार निभाती हैं। इस अध्ययन के लिए आंकड़े उपग्रह द्वारा एकत्र किए जाते हैं। इन सारे तथ्यों की जांच पड़ताल में थोड़ी सी असावधानी या मौसम में किन्हीं अप्रत्याशित कारणों से बदलाव का असर मानसून की भविष्यवाणी पर पड़ता है। इसका एक उदाहरण है, 2004 में प्रशांत महासागर के मध्य विषुवतीय क्षेत्र में समुद्री तापमान का जून महीने के अंत में बढ़ जाने के कारण मानसून की भविष्यवाणी का पूरी तरह सही न होना।
अल-नीनो भी तय करता है बरसात
मानसून का समय तो पूर्वानुमान द्वारा जाना जा सकता है लेकिन मानसून कितना अच्छा होगा और सही-सही कब आएगा, यह हम नहीं जान सकते। अल नीनो और इसकी गतिविधियों को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक कुछ हद तक पता लगा सकते हैं। सच्चाई तो यह है कि गहरे समुद्र में घटने वाली एक हलचल यानी अल नीनों ही किसी मानसून का भविष्य तय करती है। अल-नीनो कहीं प्रकृति का उपहार बनकर आती है तो कहीं यह विनाश का कारण भी बनती है।
क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो स्पैनिश भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- छोटा बालक। इसे यह नाम पेरू के मछुआरों ने बाल ईसा के नाम पर दिया बताते हैं। क्योंकि इसका प्रभाव सामान्यत: क्रिसमस के आस-पास अनुभव किया जाता है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत के भूमध्यीय क्षेत्र के समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आए बदलाव के लिए उत्तरदायी समुद्री घटना को अल-नीनो कहा जाता है। यह दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित ईक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होता है जिसके परिणाम स्वरूप समुद्र के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। सामान्यत: व्यापारिक हवा समुद्र के गर्म सतही जल को दक्षिण अमेरिकी तट से दूर ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस की ओर धकेलते हुए प्रशांत महासागर के किनारे-किनारे पश्चिम की ओर बहती है। पेरू का तटीय जल ठंडा तथा पोषक-तत्वों से समृद्ध है जो प्राथमिक उत्पादकों, विविध समुद्री पारिस्थिक तंत्रों एवं प्रमुख मछलियों को जीवन देता है। अल-नीनो के दौरान, व्यापारिक हवाएं मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है। इससे गर्म जल को सतह पर जमा होने में मदद मिलती है जिसके कारण ठंडे जल के जमाव के कारण पैदा हुए पोषक तत्वों को नीचे खिसकना पड़ता है और जलीय जीव मरने लगते हैं जिससे समुद्री पक्षियों को भोजन की कमी हो जाती है। यही अल-नीनो प्रभाव विश्वव्यापी मौसम पद्धतियों के विनाशकारी व्यवधानों के लिए जिम्मेदार है।
एक बार शुरू होने पर यह प्रक्रिया कई सप्ताह या महीनों चलती है। सामान्यत: अल-नीनो प्रभाव दस साल में दो बार और कभी-कभी तीन बार भी नजर आता है। अल-नीनो हवाओं के दिशा बदलने, कमजोर पडऩे तथा समुद्र के सतही जल के ताप में बढ़ोतरी की विशेष भूमिका निभाती है। चूंकि अल-नीनो से वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं, परिणामस्वरूप विश्व के ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होने लगती है और कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है।